आज मोबाइल की छोटी-सी स्क्रीन पर पूरी दुनिया समा गई है। एक क्लिक में फिल्में चल जाती हैं, शादी की वीडियो तुरंत फोन में आ जाती है, और टीवी भी अब दीवार पर तस्वीर की तरह टंगे रहते हैं। लेकिन एक समय ऐसा भी था, जब गांव में किसी के घर टीवी होना ही बड़ी बात मानी जाती थी। काले-सफेद टीवी को लोग बड़े गर्व से देखते थे, और जिसके घर रंगीन टीवी होता था, उसे गांव का अमीर आदमी समझा जाता था।
उस दौर में ना इंटरनेट था, ना मोबाइल, ना ही कोई ऑनलाइन मनोरंजन। मनोरंजन का मतलब था — गांव के किसी घर में VCR लगना और पूरी रात फिल्में देखना। वो सिर्फ फिल्में देखने की रात नहीं होती थी, बल्कि पूरे गांव के एक साथ बैठने, हंसने-बोलने और रिश्तों को जीने का बहाना होती थी।
जब गांव में सबसे पहले टीवी आए थे, तब B/W यानी काले-सफेद टीवी भी किसी खजाने से कम नहीं लगते थे। लोग दूर-दूर से सिर्फ टीवी देखने आ जाते थे। रविवार को जब कोई फिल्म या रामायण-महाभारत आता था, तो घर के बाहर तक लोगों की भीड़ लग जाती थी। उस समय किसी ने सोचा भी नहीं था कि एक दिन ऐसा भी आएगा, जब बिना हाथ लगाए टीवी चलने लगेगा।
फिर धीरे-धीरे रिमोट वाला जमाना आया। पहली बार जब किसी ने दूर बैठकर टीवी ऑन किया था, तो सच में ऐसा लगा था जैसे कोई जादू हो गया हो। लोग हैरानी से टीवी और रिमोट को देखते रहते थे। उस समय “वायरलेस” शब्द भी बहुत कम लोगों ने सुना था। बच्चे तो रिमोट को हाथ में लेकर खुद को किसी बड़े आदमी से कम नहीं समझते थे।
उस दौर में शादी की वीडियो बनना भी बहुत खास बात होती थी। शादी के कई हफ्तों बाद जाकर उसकी कैसेट तैयार होकर मिलती थी। पहले बड़ी VCR वाली कैसेट चलती थीं, जो सिर्फ VCR मशीन में ही लगती थीं। गांव में हर किसी के पास VCR नहीं होता था। किराये पर लाना पड़ता था। हमारे गांव में एक VCR चिड़ीमार के पास होता था और दूसरा नाथ झूर के लड़के के पास, जो टीवी ठीक करने का काम करता था।
जिस दिन घर में कैसेट लगनी होती थी, उस दिन सुबह से ही माहौल बदल जाता था। घर के सारे काम जल्दी-जल्दी निपटाए जाते थे। पड़ोसियों को पहले ही बता दिया जाता था — “आज रात हमारे घर कैसेट लगेगी, सब आ जाना।” एक दिन पहले जाकर VCR बुक करवाना पड़ता था, वरना कोई दूसरा ले जाता।
हम दो-तीन लड़के मिलकर VCR और रंगीन टीवी लेने जाते थे। क्योंकि हमारे घर में तो काले-सफेद टीवी होता था, और शादी की कैसेट या फिल्म देखने का असली मज़ा रंगीन टीवी में ही आता था। उस समय के टीवी इतने भारी होते थे कि उठाकर लाना भी किसी काम से कम नहीं लगता था। आज की तरह पतली LED नहीं थीं कि दीवार पर लगा दो और पता भी ना चले।
रास्ते में जो भी मिलता, वही पूछता — “आज किसके घर VCR लगेगा?” और फिर रात होते-होते वो भी पहुंच जाता था। गांव के लड़कों को शादी की कैसेट देखने में उतना मज़ा नहीं आता था, क्योंकि उसमें उनकी खुद की फोटो कम होती थी। उन्हें इंतजार रहता था कि कब शादी वाली कैसेट खत्म हो और फिल्मों का दौर शुरू हो।
उस समय “तबाही”, “बदला जट्टी दा”, “धर्मवीर”, “मैदान ए जंग” जैसी फिल्में खूब चला करती थीं। जैसे ही फिल्म शुरू होती, पूरा माहौल बदल जाता था। घर के आंगन में मंजे बिछा दिए जाते थे। छोटे बच्चों के लिए नीचे पल्ली बिछा दी जाती थी। कोई दीवार से टिककर बैठता, कोई मंजे पर लेट जाता।
और जो VCR वाला आदमी होता था, उसकी तो अलग ही इज्जत होती थी। उसे ऐसे रखा जाता था जैसे कोई खास मेहमान आया हो। उसके लिए अलग मंजा बिछा दिया जाता था। सबसे मजेदार बात ये थी कि VCR का रिमोट वो किसी को हाथ तक नहीं लगाने देता था। जब कैसेट आगे-पीछे करनी होती, तो उसे ही उठाया जाता था।
लेकिन चिड़ीमार हमारे पड़ोस में रहता था, इसलिए कभी-कभी वो रिमोट हमें पकड़ने दे देता था। बस फिर क्या था, रिमोट हाथ में आते ही लगता था जैसे पूरी दुनिया की ताकत मिल गई हो। भले ही उसकी जरूरत पूरी रात में दो-तीन बार ही पड़ती हो, लेकिन हम उसे हाथ से नीचे नहीं रखते थे। डर लगता था कि कहीं मिट्टी ना लग जाए या खराब ना हो जाए।
पूरी रात में मुश्किल से तीन कैसेट चल पाती थीं। कई बार फिल्म शुरू होते-होते ही नींद आंखों पर कब्जा कर लेती थी। बच्चे पल्ली पर ही सो जाते थे। सुबह आंख खुलती थी तो फिल्म खत्म हो चुकी होती थी और घर वाले उठाकर अंदर भेज रहे होते थे।
आज सब कुछ बदल गया है। अब ना VCR रहा, ना वो कैसेटें, ना वो पूरी रात जागने वाली महफिलें। अब हर घर में LED लगी हुई है। शादी की वीडियो हो या फिल्म, लोग पेन ड्राइव लगाकर अपने-अपने कमरों में अकेले देख लेते हैं।
तकनीक ने जिंदगी आसान जरूर बना दी है, लेकिन उस दौर की जो अपनापन भरी खुशी थी, वो कहीं पीछे छूट गई। पहले VCR सिर्फ फिल्म दिखाने की मशीन नहीं था, बल्कि लोगों को एक जगह बैठाने का बहाना था। रिश्तों में जो गर्माहट थी, वो उन्हीं रातों में महसूस होती थी।
आज विकास बहुत हो गया है, लेकिन शायद उसी विकास की दौड़ में वो मेल-जोल, वो इंतजार, वो साथ बैठने वाली खुशी कहीं खो गई है।
पुराने समय की बातें इसलिए खूबसूरत लगती हैं, क्योंकि उनमें साधन कम थे लेकिन अपनापन बहुत था। एक VCR पूरे गांव को एक आंगन में इकट्ठा कर देता था। आज हजारों चैनल और मोबाइल होने के बाद भी लोग अपने-अपने कमरों में अकेले बैठे हैं।
शायद चीजें आधुनिक हो गई हैं, लेकिन वो रातें… जब गांव के लोग एक साथ बैठकर फिल्में देखते थे, बच्चों की नींद पल्ली पर खुलती थी, और हाथ में रिमोट पकड़कर खुद को सबसे खास महसूस होता था — वो यादें आज भी दिल के बहुत करीब हैं।

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