आज मोबाइल में लाखों गाने एक क्लिक पर सुन लिए जाते हैं। ना कैसेट डालनी पड़ती है, ना बैटरी की चिंता होती है। लेकिन एक समय ऐसा भी था, जब गांव में किसी के घर टेप रिकॉर्डर होना बहुत बड़ी बात मानी जाती थी।
उस दौर में गाने सुनना सिर्फ शौक नहीं था, बल्कि पूरे गांव के लिए एक अलग ही खुशी होती थी। टेप रिकॉर्डर सिर्फ मशीन नहीं था, वो लोगों के इकट्ठा होने, हंसने-बोलने और यादें बनाने का जरिया था।
मुझे आज भी वो दिन अच्छे से याद हैं, जब हमारे गांव में पहली बार किसी के घर बड़ा सा टेप रिकॉर्डर आया था। काले रंग का भारी सा टेप रिकॉर्डर, जिसके दोनों तरफ बड़े-बड़े स्पीकर लगे होते थे। उसे देखते ही बच्चे उसके आसपास इकट्ठा हो जाते थे।
एक छोटा सा टेप रिकॉर्डर, जिसे वॉकमैन कहा जाता था, हम, से पैंट की जेब में डालकर अपने आप को कोई बड़ा हीरो समझने लगते थे, उसमें से ईयरफोन की तार कमीज के आला से निकल कर कान में लगाना जैसे बिना तार के गाने सुनते हैं, आज वह बात भी सच हो गई है कि अब तार लगाने की जरुरत ही नहीं पड़ती.
उस समय गाने सुनना इतना आसान नहीं था। कैसेट अलग से खरीदनी पड़ती थी। गांव की दुकानों पर ज्यादा कैसेटें नहीं मिलती थीं। शहर जाने वाला कोई आदमी अगर नई कैसेट ले आता, तो पूरे गांव में चर्चा हो जाती थी कि नई फिल्म के गाने आए हैं।
अलग अलग फिल्मों के गानों की एक लिस्ट बनानी और दुकान पर जाकर उनको एक कैसेट में रिकॉर्ड करवाना, अपने मनचाहे गानों का एक गुलदस्ता बनाया जाता था। उदास गानों की अलग कैसेट बनाना। नाच गाने वाले गानों की अलग कैसेट बनाना, पंजाबी अलग, हिंदी गानों की अलग कैसेट बनाई जाती थी।
शाम होते ही लोग घर के बाहर चारपाई डालकर बैठ जाते थे। जैसे ही टेप रिकॉर्डर पर गाना बजता, दूर तक उसकी आवाज सुनाई देती थी। पड़ोसी भी धीरे-धीरे वहीं आकर बैठ जाते थे। कोई गाने की फरमाइश करता, कोई गायक का नाम बताता, तो कोई उसी गाने के साथ गुनगुनाने लगता।
उस समय बैटरियां भी बड़ी मुश्किल से चलती थीं। कई बार बैटरी कमजोर हो जाती थी, तो गाने की आवाज धीमी पड़ जाती थी। गायक की आवाज भी अजीब सी हो जाती थी। फिर कोई कहता — “बैटरी खत्म हो गई लगती है।” और सब हंसने लगते थे।
कुछ लोग अपने टेप रिकॉर्डर को कपड़े से ढककर रखते थे, ताकि धूल ना लगे। उसे कोई हाथ लगाए, ये भी उन्हें पसंद नहीं होता था। अगर किसी बच्चे ने गलती से बटन ज्यादा दबा दिए, तो तुरंत डांट पड़ जाती थी।
सबसे ज्यादा मजा तब आता था, जब किसी की शादी होती थी। बारात जाने से पहले घर के बाहर टेप रिकॉर्डर रख दिया जाता था। ऊंची आवाज में पंजाबी और हिंदी गाने बजते थे। बच्चे वहीं नाचना शुरू कर देते थे। कुछ लोग शर्माते हुए भी धीरे-धीरे कदम मिलाने लगते थे।
कई बार रात को रेडियो पकड़ने की कोशिश भी होती थी। एंटीना को इधर-उधर घुमाकर स्टेशन ढूंढे जाते थे। जब दूर का कोई स्टेशन साफ पकड़ में आ जाता, तो ऐसा लगता था जैसे कोई बड़ी जीत मिल गई हो।
उस समय गानों में भी अलग ही अपनापन था। लोग पूरे ध्यान से गाने सुनते थे। हर गाने के बोल याद रहते थे। आज की तरह नहीं कि गाना खत्म होते ही दूसरा शुरू हो जाए और कोई याद भी ना रहे।
धीरे-धीरे समय बदला। टेप रिकॉर्डर की जगह सीडी प्लेयर आ गए। फिर मोबाइल और इंटरनेट ने सब कुछ बदल दिया। अब ना कैसेट रही, ना वो गाने रिवाइंड करने का इंतजार, ना वो बैटरी खत्म होने की चिंता।
आज हर इंसान के कान में इयरफोन है, लेकिन पहले पूरा गांव एक साथ गाने सुनता था। शायद साधन कम थे, लेकिन दिल ज्यादा जुड़े हुए थे।
पुराने समय की सबसे खूबसूरत बात यही थी कि छोटी-छोटी चीजें भी लोगों को एक-दूसरे के करीब ले आती थीं।
एक टेप रिकॉर्डर पूरे मोहल्ले की शाम को खास बना देता था। आज गाने तो लाखों हैं, लेकिन वो साथ बैठकर सुनने वाली खुशी कहीं खो गई है।
आज भी जब पुराने गाने कानों में पड़ते हैं, तो ऐसा लगता है जैसे बचपन फिर से आंखों के सामने लौट आया हो।

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