Friday, May 8, 2026

क्रेंची से करतब तक: मेरी साइकिल सीखने की कहानी

 यह उन दिनों की बात है, जब जिंदगी बहुत सीधी थी और खुशियाँ छोटी-छोटी बातों में मिल जाती थीं। न कोई बड़ी सुविधाएँ थीं, न कोई जल्दी—बस एक साइकिल थी, कुछ कच्चे रास्ते थे और सीखने का जुनून था। साइकिल चलाना सीखना उस समय हमारे लिए किसी बड़ी उपलब्धि से कम नहीं था। गिरना, संभलना, फिर उठना—यही हमारी सीखने की असली किताब थी।  

शुरुआत में तो साइकिल मेरे लिए किसी पहेली से कम नहीं थी। मैं अभी “क्रेंची” ही सीख रहा था—यानी साइकिल के डंडे के नीचे से पैर डालकर चलाना। कई बार संतुलन बिगड़ जाता और मैं धड़ाम से गिर पड़ता। चोट लगना तो जैसे रोज की बात थी। एक बार तो साइकिल के पैडल से मेरे पैर की उंगली पर इतनी जोर से चोट लगी कि वह सूज गई। आज भी वह उंगली मुझे उन दिनों की याद दिलाती है।

धीरे-धीरे मैंने हिम्मत नहीं छोड़ी और क्रेंची से डंडे पर बैठकर साइकिल चलाना सीख लिया। एक दिन मैं साइकिल लेकर सड़क पर जा रहा था। तभी मेरे चाचा नरमैल चुपचाप साइकिल के पीछे बैठ गए और मुझे पता भी नहीं चला। जब मैंने पीछे मुड़कर देखा तो हैरान रह गया—“अरे, आप कब बैठ गए?” मैंने जैसे ही सामने देखा, साइकिल सड़क से हटकर एक गड्ढे की तरफ जा रही थी। उस गड्ढे में कीकर की लकड़ियाँ और कांटे भरे हुए थे।

चाचा तो तुरंत कूदकर बच गए, लेकिन मैं साइकिल के साथ सीधा उस गड्ढे में जा गिरा। उस समय तो ज्यादा चोट नहीं लगी, लेकिन कांटों और लकड़ियों से खरोंचें जरूर आ गईं। किसी तरह मैंने खुद को संभाला और साइकिल को बाहर निकाला। उस दिन समझ आया कि साइकिल चलाने में ध्यान कितना जरूरी होता है।

एक और मजेदार लेकिन मुश्किल घटना भी याद आती है। मैं साइकिल से घूम रहा था कि तभी ताया जी के बेटे मांगे राम ने मुझे चाय की डोली पकड़ाते हुए कहा—“इसे दूसरे अड्डे पर रामकरण की लकड़ी की दुकान पर दे आओ।” मैं साइकिल पर चाय लेकर निकल पड़ा। रास्ते में एक गहरा जोहड़ था, जिसमें पानी कम लेकिन कीचड़ ज्यादा था। जैसे ही मैंने साइकिल संभालने की कोशिश की, संतुलन बिगड़ गया और मैं चाय की डोली समेत जोहड़ में जा गिरा।

चाय की डोली कीचड़ में धंस गई और उसका ढक्कन भी खुल गया। अब हालत ये थी कि डोली के अंदर की चाय और बाहर का कीचड़ भरा पानी—दोनों का रंग एक जैसा लग रहा था। मुझे समझ ही नहीं आया कि चाय में कीचड़ का पानी मिला है या नहीं। मैंने जल्दी से डोली उठाई, ढक्कन बंद किया और जैसे-तैसे साइकिल को बाहर निकाला। कपड़े पूरी तरह कीचड़ से भर चुके थे, लेकिन फिर भी मैं उसी हालत में चाय देने दुकान पर पहुंच गया।

धीरे-धीरे समय के साथ मैं साइकिल चलाने में माहिर हो गया। अब साइकिल सिर्फ चलाने की चीज नहीं रही थी, बल्कि जिंदगी का हिस्सा बन गई थी। खेत से घास लाना हो, लकड़ियाँ लानी हों—सब काम साइकिल से होने लगे। और फिर तो साइकिल चलाना जैसे एक खेल बन गया।

कभी उलटी क्रेंची चलाना, कभी हैंडल से हाथ छोड़ देना, कभी हाथ बदल-बदलकर चलाना—हम हर तरह के नए-नए तरीके आजमाने लगे। कभी पीछे की सीट पर बैठकर चलाना, कभी हैंडल पर बैठकर। हमारे गांव में एक लड़का था, जिसे हम “चिड़ीमार” कहते थे। वह साइकिल पर ऐसे-ऐसे करतब करता था जैसे कोई सर्कस का खिलाड़ी हो। उसे देखकर हमारे अंदर भी जोश आ जाता था कि हम भी ऐसा ही कुछ करें।

साइकिल अब सिर्फ एक साधन नहीं रही थी, बल्कि हमारे बचपन की आज़ादी और मस्ती की पहचान बन गई थी।


आज जब जिंदगी में बहुत कुछ बदल गया है, तब भी वो साइकिल के दिन दिल के सबसे करीब हैं। वो गिरना, संभलना, हंसना और फिर से कोशिश करना—यही तो असली सीख थी। शायद आज हमारे पास सब कुछ है, लेकिन वो साइकिल वाली खुशी कहीं पीछे छूट गई है।

कभी-कभी दिल करता है कि फिर से वही पुरानी साइकिल मिल जाए, और हम फिर से उसी बेफिक्री के साथ कच्चे रास्तों पर निकल पड़ें।

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