9वीं और 10वीं मैंने अपने गाँव के सरकारी स्कूल से पास की थी। उसके बाद आगे की पढ़ाई के लिए पास के गाँव ठोल के सरकारी स्कूल में 11वीं कक्षा में दाखिला ले लिया। उस समय मेरे साथ मेरे चाचा का लड़का दर्शन और दूसरे चाचा की बेटी परमजीत, जिसे हम प्यार से बेबी कहते थे, भी उसी स्कूल में पढ़ते थे। मैं और दर्शन 11वीं में थे, जबकि बेबी 12वीं में पढ़ रही थी।
हर सुबह का एक अपना ही अलग किस्सा होता था। बेबी समय पर तैयार होकर मेरे घर आ जाती थी, और मैं उस समय गहरी नींद में होता था। कई बार तो वही मुझे उठाती थी—“स्कूल का टाइम हो गया है, जाना नहीं क्या?” उसकी आवाज़ सुनकर मैं हड़बड़ाकर उठता, जल्दी-जल्दी मुँह-हाथ धोता, वर्दी पहनता और तैयार हो जाता। उस समय मोबाइल फोन नहीं होते थे, इसलिए समय की बर्बादी का कोई सवाल ही नहीं था।
फिर हम दोनों अपनी पुरानी सी साइकिल उठाते और स्कूल की ओर चल पड़ते। वो साइकिल भी जैसे हमारी जिंदगी की तरह ही संघर्षों से भरी हुई थी। कभी उसकी चेन उतर जाती, कभी कोई नट ढीला हो जाता, तो कभी पैडल अजीब सी आवाज़ करने लगते। पंक्चर होना तो जैसे आम बात थी। मैं साइकिल चलाता और बेबी पीछे कैरियर पर बैठ जाती, अपने और मेरे दोनों के बैग संभालते हुए।
दोपहर की छुट्टी के समय जब हम घर लौटते, तो गर्मी अपने चरम पर होती थी। धूप इतनी तेज़ होती कि हालत खराब हो जाती। एक बार की बात मुझे आज भी याद है—मेरे जूते आगे से फट गए थे। जूते सफेद रंग के थे और आगे काले रंग की पट्टी थी। जब जूते फटे तो मेरा अंगूठा बाहर झाँकने लगा। तब मेरे दिमाग में एक छोटा सा उपाय आया। मैंने एक काला लिफाफा लिया और उसे अपने अंगूठे पर बाँध लिया, फिर जूता पहन लिया। अब वो काला लिफाफा जूते की काली पट्टी के साथ ऐसे मिल गया कि किसी को पता ही नहीं चला। कुछ दिन इसी तरह काम चल गया।
गाँव के स्कूल में जब पढ़ता था, तब मेरी वर्दी खाकी पैंट और सफेद कमीज़ थी। एक दिवाली के दिन पटाखा हाथ में फट गया था, जिससे मेरी कमीज़ में कई जगह छोटे-छोटे काले छेद हो गए थे। बाद में थोले वाले स्कूल की वर्दी नीली चेक की कमीज़ और सुरमई रंग की पैंट थी। लेकिन साइकिल चलाते समय एक और समस्या अक्सर सामने आती थी—चेन कवर न होने के कारण पैंट चेन में फँस जाती और नीचे से फट जाती। कई बार तो संतुलन बिगड़ने पर गिर भी जाता था।
एक ऐसी ही घटना आज भी यादों में ताज़ा है। उस समय मैं स्कूल के बाद चंडीगढ़ में एक दफ्तर में नौकरी भी करने लगा था। एक दिन मैं अपने कंधे पर कपड़े में बाँधकर एक टीवी लेकर जा रहा था। अचानक साइकिल की चेन में मेरा पायजामा फँस गया और मैं संतुलन खो बैठा। गिरते ही टीवी ज़मीन पर गिरकर चकनाचूर हो गया। उस दिन का वो झटका आज भी याद है।
इन सब घटनाओं के बीच एक बात हमेशा मेरे साथ रही—मेरी झिझक। मुझे कभी भी लोगों के साथ खुलकर बात करने में आसानी नहीं हुई। स्कूल में भी मेरे बहुत कम दोस्त थे। जिनसे दोस्ती थी, उनसे भी एक छोटी सी बात पर झगड़ा हो गया और आज तक उनसे बात नहीं हो पाई। कभी-कभी समझ नहीं आता कि ये हमारी ज़िद होती है, अहंकार होता है या कुछ और। शायद यही वजह रही कि हम जिंदगी में उतनी तरक्की नहीं कर पाए जितनी कर सकते थे।
लेकिन जब पीछे मुड़कर देखता हूँ, तो ये छोटे-छोटे संघर्ष, वो साइकिल के सफर, वो टूटी चप्पलें और जुगाड़ वाले दिन—यही सब मेरी जिंदगी की सबसे सच्ची और अनमोल यादें हैं। ये वही दिन हैं जिन्होंने मुझे सिखाया कि हालात चाहे जैसे भी हों, चलना नहीं छोड़ना चाहिए।

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