कभी-कभी ज़िंदगी की भागदौड़ में अचानक मन कहीं पीछे लौट जाता है… उन दिनों में, जब न कोई चिंता थी, न कोई बड़ी जिम्मेदारी। बस एक सादा सा जीवन था और उसमें छुपी अनगिनत खुशियाँ। गाँव का वो बचपन, जो आज भी यादों में जिंदा है।
गाँव की सुबह अपने आप में एक अलग ही सुकून लेकर आती थी। सूरज निकलने से पहले ही चिड़ियों की चहचहाहट कानों में घुल जाती थी। दूर कहीं से मुर्गे की बांग सुनाई देती, और हल्की-हल्की ठंडी हवा मन को ताजा कर देती। माँ की आवाज़ से नींद खुलती—“उठ जा, सुबह हो गई।” आँखें तो खुल जाती थीं, लेकिन मन अभी भी बिस्तर में ही रहना चाहता था।
घर के आँगन में झाड़ू लगती, कुएँ या हैंडपंप से पानी भरा जाता, और चूल्हे पर बनती गरम-गरम रोटियों की खुशबू पूरे घर में फैल जाती। वो मिट्टी की महक, वो ताजी हवा… आज के शहरों में लाख कोशिश कर लो, वो एहसास नहीं मिलता।
फिर शुरू होता था दिन का असली मज़ा—स्कूल जाने का बहाना और रास्ते में दोस्तों के साथ मस्ती। कभी खेतों के किनारे-किनारे चलते, कभी पेड़ों से कच्चे आम तोड़ते, तो कभी रास्ते में ही खेल में लग जाते। स्कूल की पढ़ाई से ज्यादा याद हैं वो हंसी-मजाक, वो शरारतें और वो दोस्ती।
दोपहर का समय भी कम खास नहीं होता था। गर्मियों की तेज धूप में पूरा गाँव जैसे थोड़ी देर के लिए थम जाता था। खेतों से लौटकर लोग अपने-अपने घरों में आराम करते, और हम बच्चे छांव में बैठकर या तो कहानियां सुनते या फिर लूडो, कैरम जैसे खेल खेलते।
कभी-कभी दादी-नानी की कहानियां सुनने का मौका मिलता—राजा-रानी की कहानियां, या फिर पुराने समय की बातें। वो कहानियां सिर्फ मनोरंजन नहीं थीं, उनमें जीवन के छोटे-छोटे सबक छुपे होते थे, जो आज समझ में आते हैं।
और फिर आती थी शाम… शायद दिन का सबसे खूबसूरत हिस्सा। जैसे ही सूरज ढलता, पूरे गाँव में एक अलग ही रौनक आ जाती। बच्चे फिर से बाहर निकल आते, गलियों में दौड़ते-भागते, कबड्डी, गिल्ली-डंडा, कंचे खेलते।
बुजुर्ग चौपाल पर बैठकर बातें करते, कोई हंसी-मजाक करता, तो कोई पुराने किस्से सुनाता। उस समय न मोबाइल था, न इंटरनेट… लेकिन फिर भी कोई अकेला नहीं था। हर कोई किसी न किसी से जुड़ा हुआ था।
रात को छत पर या आँगन में चारपाई डालकर सोना, खुले आसमान के नीचे तारों को गिनना… वो एहसास आज भी दिल को सुकून देता है। हवा में एक ठंडक होती थी, और मन में एक अजीब सी शांति।
आज जब हम शहरों की भागदौड़ में फंसे हैं, तो वो दिन किसी सपने जैसे लगते हैं। लेकिन सच तो यह है कि वही दिन हमारी ज़िंदगी की सबसे सच्ची और सबसे खूबसूरत यादें हैं।
वो गाँव की सुबह, वो दोपहर की सुस्ती, और वो शाम की रौनक… ये सिर्फ यादें नहीं हैं, ये हमारी पहचान हैं। ये हमें याद दिलाती हैं कि खुशी बड़ी चीजों में नहीं, बल्कि छोटी-छोटी बातों में छुपी होती है।
शायद वक्त बदल गया है, हालात बदल गए हैं, लेकिन दिल के किसी कोने में आज भी वो बचपन जिंदा है… और जब भी याद आता है, चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कान जरूर ले आता है।

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