Saturday, April 11, 2026

एक सफर… जो मंज़िल से ज्यादा सुकून दे गया

 अंबाला ऑफिस से उस दिन काम खत्म करके मैं घर के लिए निकल चुका था। सर्दियों के दिन थे, इसलिए शाम होते-होते अंधेरा जल्दी ही घिर आया था। मुझे बस मानव चौक से मिलनी थी, इसलिए मैंने सोचा कि पैदल ही चल पड़ता हूँ। ऑफिस से चौक ज्यादा दूर नहीं था, करीब पाँच मिनट में ही मैं वहाँ पहुँच गया। 


चौक पर हल्की-हल्की भीड़ थी, हर कोई अपने-अपने घर जाने की जल्दी में था। कुछ ही देर में मेरी बस भी आ गई। बस देखते ही समझ आ गया कि आज का सफर थोड़ा मुश्किल रहने वाला है। बस पहले से ही खचाखच भरी हुई थी। यह आखिरी बस थी, इसलिए हर कोई उसी में जगह बनाने की कोशिश कर रहा था। कुछ लोग तो बस के अंदर जगह न मिलने पर ऊपर छत पर भी बैठ गए थे।

मैं भी किसी तरह बस में चढ़ गया। अंदर इतनी भीड़ थी कि खड़े होने के लिए भी जगह मुश्किल से मिल रही थी। कंडक्टर ने कुछ देर बाद सीटी बजाई और बस धीरे-धीरे भीड़ भरी सड़क पर हॉर्न बजाती हुई आगे बढ़ने लगी। शहर के अंदर जितनी भीड़ थी, उतनी ही बस के अंदर भी। रास्ते भर अलग-अलग जगहों से सवारियाँ चढ़ती रहीं—कहीं दुर्गा नगर से, कहीं इंडस्ट्रियल एरिया से।

मुझे थोल उतरना था, क्योंकि वहीं पेट्रोल पंप पर मेरी बाइक खड़ी थी। शुरुआत में तो मैं खड़ा ही रहा, लेकिन कुछ दूर जाने के बाद कुछ सवारियाँ उतरीं, तो मुझे बैठने के लिए एक सीट मिल गई। मैंने चैन की सांस ली और बैठ गया।

मेरे सामने वाली सीट पर एक बुजुर्ग महिला बैठी थी। उनके चेहरे पर हल्की चिंता साफ दिखाई दे रही थी। वह बार-बार ड्राइवर से कह रही थीं, “भाई, मुझे आगे शाहबाद वाली बस पकड़नी है, कहीं छूट न जाए, जरा जल्दी चलाओ।”

उनकी बातों से पता चला कि उन्हें थोल से आगे बिजड़पुर जाना था, जहाँ उनके किसी रिश्तेदार के यहाँ माता का जागरण था। वह उसी के लिए आई थीं, लेकिन रास्ते में देर हो गई थी और अब उन्हें चिंता सता रही थी कि कहीं वह समय पर पहुँच न पाएं।

उधर मेरे फोन पर भी घर से लगातार कॉल आ रहे थे। हर बार एक ही सवाल—“कितनी देर में पहुँचोगे?”
मैं हर बार यही कह देता, “बस 15 मिनट में थोल पहुँच जाऊँगा।”

लेकिन वो 15 मिनट कब 45 मिनट में बदल गए, पता ही नहीं चला।

आखिरकार बस थोल पहुँच गई। हम सभी यात्री नीचे उतर गए। अब अंधेरा काफी हो चुका था। आसपास सन्नाटा सा लग रहा था। उस बुजुर्ग महिला के चेहरे पर अब चिंता और बढ़ गई थी। उनके पास किसी को बुलाने के लिए फोन नंबर भी नहीं था।

उन्होंने मुझसे पूछा, “बेटा, तुम कहाँ जाओगे?”
मैंने कहा, “मुझे तो दूसरे रास्ते जाना है।”

यह सुनकर वह और भी परेशान हो गईं। कुछ पल के लिए मैं भी सोच में पड़ गया। फिर मैंने उनसे कहा, “आप 10 मिनट रुकिए, मैं अपनी बाइक लेकर आता हूँ, आपको थोड़ा आगे तक छोड़ देता हूँ।”

उन्होंने हल्की उम्मीद भरी नजरों से मुझे देखा और कहा, “ठीक है बेटा, मैं यहीं इंतजार करती हूँ।”

मैं जल्दी-जल्दी पेट्रोल पंप की तरफ गया, अपनी बाइक उठाई और वापस लौटा। करीब 10 मिनट बाद जब मैं वहाँ पहुँचा, तो वह महिला वहीं खड़ी थीं। मुझे देखकर उन्होंने राहत की सांस ली और कहा, “मुझे लगा था कि अब तुम नहीं आओगे।”

मैंने मुस्कुराते हुए कहा, “ऐसा कैसे हो सकता है, बैठिए।”

वह बाइक पर बैठ गईं और हम दोनों बिजड़पुर की तरफ चल पड़े। रास्ता सुनसान था, ठंडी हवा चल रही थी, लेकिन उस समय मन में एक अलग ही सुकून था।

उधर घर से फोन लगातार आ रहे थे। अब शिकायत का स्वर साफ सुनाई दे रहा था—“15 मिनट बोले थे, अब आधा घंटा हो गया, अभी तक नहीं पहुँचे!”

मैं बस इतना कहता, “बस आ रहा हूँ…”

करीब 20 मिनट बाद हम बिजड़पुर गाँव पहुँच गए। मैंने उन्हें उनके घर के सामने उतार दिया।

बाइक से उतरते ही उन्होंने मेरी तरफ देखा और भावुक होकर कहा, “बेटा, अगर तुम मुझे छोड़ने नहीं आते, तो पता नहीं मैं कैसे पहुँचती।”

उन्होंने जेब से 100 रुपये का नोट निकाला और मेरी तरफ बढ़ाते हुए कहा, “यह रख लो, पेट्रोल डलवा लेना।”

मैंने तुरंत मना कर दिया—“नहीं माता जी, इसकी जरूरत नहीं है।”

लेकिन वह मानने को तैयार नहीं थीं। उन्होंने फिर जोर दिया। तब मैंने मुस्कुराते हुए कहा, “अगर देना ही है, तो माता के जागरण में मेरे नाम से चढ़ा देना।”

यह सुनकर उनके चेहरे पर एक सुकून भरी मुस्कान आ गई। उन्होंने मुझे ढेर सारे आशीर्वाद दिए।

मैं वहाँ से वापस लौट पड़ा। अब घर पहुँचने में देर हो चुकी थी, और यह तय था कि घर पहुँचकर थोड़ी “डांट” भी सुननी पड़ेगी।

लेकिन उस समय दिल में एक अजीब सा सुकून था।

कभी-कभी जिंदगी में ऐसे छोटे-छोटे मौके आते हैं, जब हम किसी के लिए कुछ कर सकते हैं। उस दिन मैंने बस वही किया जो मुझे सही लगा।

शायद जिंदगी भी यही सिखाती है—
जब किसी को जरूरत हो, तो जितना हो सके, उसकी मदद कर दो।

क्योंकि मुश्किल समय में अक्सर रास्ते नहीं मिलते…
लेकिन कहीं न कहीं से कोई इंसान जरूर मिल जाता है,
जो उस रास्ते को थोड़ा आसान बना देता है।

और शायद वही इंसान, किसी और के लिए
एक छोटी सी उम्मीद बन जाता है… 

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