वक़्त अच्छा हो तो अपनी चलती है,
खराब हो तो सबकी चलती है।
ज़िंदगी में हर इंसान कभी न कभी इस सच से गुजरता है।
जब सब कुछ अच्छा चल रहा होता है,
तो लगता है जैसे दुनिया हमारी मुठ्ठी में है।
लेकिन जैसे ही वक़्त करवट लेता है,
वैसे ही हालात, लोग और रिश्ते — सब बदलने लगते हैं।
तभी दिल से यह बात निकलती है —
“वक़्त अच्छा हो तो अपनी चलती है,
खराब हो तो सबकी चलती है।”
अच्छा वक़्त – जब सब अपने लगते हैं
जब समय हमारे साथ होता है,
तो हमारी हर बात में वजन होता है।
लोग हमारी राय पूछते हैं,
हमारी बातें सुनी जाती हैं,
और हर रास्ता आसान लगने लगता है।
उस समय लगता है कि
हम ही अपनी ज़िंदगी के सबसे बड़े फैसले लेने वाले हैं।
पर शायद हम भूल जाते हैं —
यह सब वक़्त का असर है।
खराब वक़्त – असली पहचान का समय
जब वक़्त खराब होता है,
तो वही लोग जो कभी साथ थे,
धीरे-धीरे दूर होने लगते हैं।
हमारी बातें अनसुनी होने लगती हैं,
हमारे फैसलों पर सवाल उठने लगते हैं।
ऐसा लगता है जैसे
अब हमारी नहीं,
दूसरों की चल रही है।
लेकिन सच यही है —
यही वो समय होता है
जब हमें असली दुनिया और असली लोग दिखाई देते हैं।
वक़्त हमें क्या सिखाता है
वक़्त कभी स्थिर नहीं रहता।
न अच्छा वक़्त हमेशा रहता है,
न बुरा वक़्त हमेशा रहता है।
पर हर दौर हमें कुछ सिखाकर जरूर जाता है:
- अच्छा वक़्त सिखाता है विनम्र रहना
- बुरा वक़्त सिखाता है मजबूत बनना
और सबसे जरूरी —
खुद पर भरोसा रखना
इसलिए अगर आज वक़्त आपका साथ दे रहा है,
तो घमंड मत कीजिए।
और अगर वक़्त आपके खिलाफ है,
तो निराश मत होइए।
क्योंकि वक़्त बदलते देर नहीं लगती…
और जिस दिन वक़्त फिर आपका होगा,
उस दिन हालात भी बदलेंगे
और लोग भी।
याद रखिए —
वक़्त ही असली बादशाह है,
हम तो बस उसके खेल के किरदार

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