वो दिन जो कभी लौटकर नहीं आते+
इस दुनिया में कौन है जो अपने बचपन के दिन भूलना चाहेगा? शायद कोई भी नहीं।
भगवान ने शायद पूरी ज़िंदगी में बचपन को ही सबसे प्यारा बनाया है—
मासूमियत से भरा, शरारतों से सजा, और मिट्टी की खुशबू से महकता हुआ।
आज हम बड़े हो गए हैं, ज़िम्मेदारियों में उलझ गए हैं। लेकिन दिल की गहराइयों में आज भी कोई कोना ऐसा है जो उन दिनों को पुकारता है—
“एक बार फिर वही बचपन लौटा दो…”
वो बचपन… जब बड़े होने की जल्दी थी
बचपन में लगता था—
कब बड़े होंगे, कब स्कूल की छुट्टी होगी, कब मां-बाप की डांट से मुक्त हो जाएंगे।
पर अब समझ आता है—
वो ही दिन असली खज़ाना थे।
आज जिंदगी भागती-दौड़ती है, पर ठहरती कहीं नहीं।
पर बचपन?
वो तो बिना डर, बिना फिक्र, बिना किसी तनाव के बीत जाता था।
आँगन, मिट्टी और कंचों की बोरी
जहाँ थोड़ा-सा भी खाली आँगन दिख जाता, हम मिट्टी खोदकर कंचे खेलने लग जाते।
कंचों की बोतलें भर लेना, झकरीयाँ कंचों से भर देना—
जैसे कोई खज़ाना जमा कर रहे हों।
उस समय कौन सोचता था कि एक दिन कंचे खेलने वाले बच्चे ही गायब हो जाएंगे,
और आँगन सीमेंट-कोंक्रीट के नीचे दब जाएँगे।
नीम के पेड़ पर ‘पील पलंगड़ा’ और बिना डर की ऊँचाइयाँ
नीम के पेड़ पर चढ़कर ‘पील पलंगड़ा’ खेलना तो जैसे हमारी रोज़मर्रा की क्रिया थी।
पेड़ से गिरने का डर?
बिल्कुल नहीं।
उस समय खेल ही सब कुछ था—
डर, दर्द, और चोटें भी सिर्फ खेल का हिस्सा लगती थीं।
गली-गली में गूँजते खेल—खो-खो, पकड़ापकड़ी, लुक-मचाई
गुल्ली-डंडा, खो-खो, लुक-मचाई, पकड़न-पकड़ाई…
और वो मजेदार खेल—
“किनमन-कानी कौन कीन्या”
जिसमें हम बोलते थे:
“लुकजो छिपजो कनक का दाणा, टोहा ना पाणा…”
हँसी आ जाती है याद करके,
की क्या अनोखे नाम और क्या अनोखी खुशी थी!
एक खेल और था—
“कोरडा सा जुमे रात आयी ए…”
गुरदास मान के गीत “मुड़-मुड़ याद सतावे…” में भी यही बचपन की धड़कनें गूँजती हैं।
लड़कियों की ‘किकली’, पुर-पुर और जामुन के पेड़ों पर निर्भय चढ़ाई
लड़कियों की किकली का वो गोल-गोल घूमता झूला…
कितना प्यारा दृश्य होता था।
हम लड़के?
हम तो पुर-पुर खेलते, सड़कों से छोटी-छोटी रोड़ी इकठी करते थे।
जामुन तोड़ना तो एक कला थी—
और पेड़ पर चढ़ने पर कभी-कभी यह अफवाह सुनते—
“इस पेड़ पर भूत है”
ताकि बच्चे उनके खेतों में न घुसें।
बरसात—जोहड़, भैंसें, तैराकी और जोक (लीच) का डर
बरसात में जोहड़ पानी से भरे रहते।
भैंसों को पानी पिलाने जाते और खुद भी तैरने लग जाते—
उसी पानी में जिसमें भैंसें नहाती थीं!
जोक लग जाने पर सफेद नमक रखकर चलते थे।
जैसे ही नमक डालते, जोक छूटकर गिर जाती।
बारिश का मौसम मतलब—
स्लाइडिंग, गारे में लथपथ होना और शाम तक भीगे रहना।
आंधी का मज़ा—किक्कर की सूखी लकड़ियाँ बटोरना
आंधी देखते ही हम सड़क पर दौड़ आते थे।
किक्कर के पेड़ से सूखी लकड़ियाँ गिरती थीं।
जितनी ज्यादा लकड़ियाँ,
उतना ज्यादा घर में सम्मान!
दिनभर बाहर, रात को ही घर—क्योंकि ज़िंदगी बेफिक्र थी
छुट्टी वाले दिन सुबह घर से निकल जाना,
दोपहर में खाना, फिर बाहर और फिर शाम को घर…
या कई बार रात को ही घर लौटना।
ना मोबाइल, ना घड़ी,
ना टेंशन, ना किसी चीज़ का डर।
बस खेल, मौज और मस्ती।
बचपन सिर्फ उम्र नहीं, एहसास है
आज हम बड़े हो गए हैं,
पर बचपन की यादों ने अब भी हमें छोड़ा नहीं है।
वो यादें हमारी ज़िंदगी की पूँजी हैं—
जो कभी मिटती ही नहीं।
मैं तो अपना बचपन बिल्कुल भी नहीं भूल सकता,
और मुझे यकीन है
आप भी नहीं भूल सकते।
क्योंकि बचपन…
दिल की वो जगह है
जहाँ लौटकर हर इंसान खुश हो जाता है।
आपकी सबसे प्यारी बचपन की याद कौन-सी है?
कमेंट में जरूर लिखें—
आपके बचपन का वो कौन सा खेल, शरारत या याद है जो आज भी दिल में जिंदा है?
आपकी कहानी शायद किसी और के बचपन को भी जगा दे।

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