Tuesday, November 25, 2025

गाँव की वो रंगीन सुबह — कपड़ों वाला तारा चंद

यह तस्वीर देखकर मन एकदम 10–12 साल पीछे उसी पुराने आँगन में पहुँच जाता है, जहाँ सुबह की धूप हल्की-हल्की दीवारों पर फैलती थी और घर की औरतें चारपाई पर बैठकर कपड़ों का मुआयना किया करती थीं। यह सिर्फ एक तस्वीर नहीं, बल्कि गाँव के उस जीवन की झलक है जहाँ हर चेहरा, हर आवाज़ और हर रिश्ता एक अपनापन लेकर आता था। 


इस तस्वीर में मेरी माताजी, चाची और ताई जी एक साथ बैठी दिख रही हैं—जैसे किसी छोटे से घरेलू मेले में रंग बिखरे हों। कपड़े बेचने वाला जो शख्स है, वह कोई अनजाना व्यापारी नहीं था; वह हमारा अपना, शांति नगर गाँव का तारा चंद था।

तारा चंद सिर्फ कपड़े नहीं बेचता था, वह रिश्ते भी बुनता था। वह हमारा सत्संगी था, इसलिए घरवालों का उस पर खास भरोसा था। घर की महिलाएँ जानती थीं कि उसके लाए कपड़े अच्छे होंगे, दाम सही होंगे और अगर पैसे न भी हों तो उदारी आसानी से मिल जाएगी। उधारी का हिसाब भी कोई बाजार जैसा नहीं—बस भरोसा और मुस्कान पर टिका एक पुराना रिश्ता।

तारा चंद हर तीन-चार दिन में एक चक्कर जरूर लगाता था। उसके आते ही घर में हलचल बढ़ जाती—
“अरे, तारा चंद आया है, इस बार कौन-कौन से नए प्रिंट लाया होगा?”
चारपाई उसके लिए हमेशा तैयार रहती। वह कपड़ों की गठरी खोलता और जैसे ही नए दुपट्टों, सलवारों या सूटों के रंग सामने आते, चेहरों पर एक अलग ही चमक आ जाती।

बच्चों की खुशी अलग ही थी

जब वह गठरी खोलता, तो बच्चे कपड़ों के ढेर में अपनी छोटी-सी दुनिया ढूंढ लेते।
कभी कोई चमकीला टुकड़ा उठाकर कहता—
“माँ, इससे मेरा फ्रॉक बन जाएगा?”
तो तारा चंद मुस्कुराकर बोलता—
“अरे, यह तो बड़ा वाला कपड़ा है, इससे छोटों के फ्रॉक नहीं बनते।”

इस तस्वीर में मेरी माता जी कपड़ा उठाकर उसके कपड़े की बुनाई देख रही है; कोई हाथ से कपड़ा टटोल रही है; कोई दाम पूछ रही है; और बच्चे भी पास ही बैठे धूप सेंकते हुए इस छोटे से ‘फैशन शो’ का हिस्सा बने हुए हैं।

गाँव का जीवन ऐसा ही तो होता था—सादगी, अपनापन और छोटे-छोटे पलों में छिपी बड़ी खुशियाँ।

उस समय घरों में आज जैसी पॉलिश्ड टाइलें नहीं होती थीं। मिट्टी के आँगन, पुरानी दीवारें, कहीं-कहीं टूटा कोना—लेकिन उन दीवारों में जीवंतता और अपनापन था।
जब तारा चंद कपड़े फैलाता, तो वह पूरा आँगन एक छोटा-सा बाज़ार बन जाता था।
न एसी, न फैंसी शोरूम—बस धूप, चारपाई और एक विश्वास से भरा रिश्ता।

धीरे-धीरे वक्त बदल गया।
अब कपड़े मोबाइल पर देखे जाते हैं, ऑनलाइन मंगाए जाते हैं, और घर पर कोई चारपाई पर कपड़े फैलाकर देखने का मज़ा ही गायब हो गया।
आज तारा  चंद भी कपडे बेचने का काम छोड़कर अपने बेटे के साथ अम्बाला में रहने लगा है।  

तारा चंद जैसे लोग धीरे-धीरे कम हो गए—और शायद उनकी जगह अब कभी कोई नहीं ले सकता।

पर तस्वीरें और यादें कभी पुरानी नहीं होतीं।
इस तस्वीर की तरह—जो वर्षों बाद भी वही गर्माहट देती है, वही मुस्कान लौटाती है, और वही सरल जीवन फिर सामने खड़ा कर देती है।

आज जब इतने साल बाद यह तस्वीर सामने आती है तो दिल कहता है—
वक्त भले ही बदल गया हो, पर उन दिनों की खुशबू अब भी मन में ताज़ा है।
तारा चंद जैसे लोग सिर्फ कपड़े नहीं बेचते थे; वे एक ऐसा रिश्ता पीछे छोड़ जाते थे जो वर्षों बाद भी मुस्कुराहट दे जाता है।

No comments:

Post a Comment

उम्मीद का दीया

  एक घर में पाँच दीये जल रहे थे।  उनकी रोशनी से पूरा घर जगमगा रहा था। हर दीया अपने भीतर एक अलग संदेश और एक अलग भावना लिए हुए था। पहला दीया उ...