मज़बूरियाँ ही तो हैं जो गाँव से दूर रखती हैं, वरना दिल तो आज भी वहीं खेतों में भटकता है
लेखक: Suresh Kumar
कभी-कभी रात के सन्नाटे में जब खिड़की के बाहर शहर की पीली रोशनियाँ टिमटिमाती हैं, तो मन अचानक कहीं और चला जाता है — उस गाँव में, जहाँ न बिजली की चमक थी, न ट्रैफिक की आवाज़, बस शांति थी, मिट्टी की सोंधी खुशबू थी, और अपनेपन का एहसास था।
सच कहा जाए तो गाँव छोड़कर शहर आ जाना एक मजबूरी थी, चाह नहीं। गाँव ने तो हमेशा हमें अपनाया, लेकिन ज़िंदगी की रफ़्तार, कमाई की तलाश और भविष्य की दौड़ ने हमें गाँव से दूर कर दिया।
वो गाँव की सुबहें…
गाँव की सुबहें कितनी अलग होती थीं। मुर्गे की बाँग, बैलों की घंटियों की छनक और दूर से आती चक्की की आवाज़ — सब मिलकर एक अनोखी धुन बनाते थे।
हम बच्चे अक्सर नींद में भी मुस्कुराते थे, क्योंकि पता होता था कि आज फिर खेत जाना है, मिट्टी में खेलना है, और नहर में नहाना है।
माँ उस समय चूल्हे पर रोटियाँ सेंक रही होती थीं, और पिता खेत की दिशा में निकल चुके होते।
सूरज की पहली किरण जब खेतों पर पड़ती, तो धान की बालियों से ओस की बूँदें मोतियों की तरह चमकती थीं।
कभी-कभी लगता है कि वो दृश्य किसी सपने से कम नहीं था — एक सच्चा, सुंदर और आत्मा को छू जाने वाला सपना।
खेत, मिट्टी और अपनापन
गाँव के खेत सिर्फ खेती का ज़रिया नहीं थे, वो हमारी पहचान थे।
हर एक मेड़, हर पेड़, हर झोपड़ी में बचपन के निशान थे।
हम भैंसों के पीछे-पीछे खेतों तक जाते, मिट्टी में नंगे पैर दौड़ते, और किसी गड्ढे में गिर जाएँ तो भी कोई डर नहीं — बस हँसी और मस्ती।
बरसात के दिनों में जब खेतों में पानी भर जाता, तो हम कागज़ की नावें बनाकर बहाते।
वो नावें भले ही कुछ दूर जाकर डूब जातीं, लेकिन उनमें भरा बचपन आज तक तैरता है।
पेड़, पगडंडियाँ और वो रास्ते
गाँव की पगडंडियाँ जैसे अपनेपन की डोर होती थीं।
हर मोड़ किसी याद से जुड़ा था — कहीं आम का पेड़ था जहाँ हम चोरी से आम तोड़ते, तो कहीं वो बरगद का पेड़ जिसके नीचे बुज़ुर्गों की चौपाल जमती थी।
शाम को जब सूरज डूबता, तो पूरा आसमान सुनहरी रोशनी में नहाता था।
उस वक्त न मोबाइल की घंटियाँ बजती थीं, न किसी को जल्दी होती थी।
बस समय ठहर जाता था — गाँव की हवा में, रिश्तों की सादगी में, और मिट्टी की खुशबू में।
अब गाँव से दूर…
आज शहर में रहकर सब कुछ है — नौकरी, पैसा, मकान, लेकिन वो सुकून कहीं नहीं।
यहाँ लोग अपने में इतने व्यस्त हैं कि “कैसे हो?” पूछना भी औपचारिकता बन गया है।
गाँव में तो कोई दरवाज़ा खटखटाता नहीं था, सीधा भीतर चला आता था, “अरे राम-राम! चलो चाय पीते हैं।”
वो अपनापन अब खो गया है।
कभी जब ऑफिस की खिड़की से बाहर देखता हूँ, तो लगता है —
काश, इस कंक्रीट के जंगल की जगह वो हरे खेत होते,
वो मिट्टी होती, वो ठंडी हवा, वो खुला आसमान होता।
पर सच यही है —
"मज़बूरियाँ ही तो हैं जो गाँव से दूर रखती हैं,
वरना दिल तो आज भी वहीं खेतों में भटकता है।"
बचपन की यादें — जैसे कोई अधूरी कहानी
हर त्योहार, हर मौसम गाँव की याद दिला जाता है।
दीवाली पर मिट्टी के दीये, होली पर रंगों की टोली, सावन में झूले और मेले…
वो सब अब सिर्फ यादों में हैं।
जब कभी गाँव जाता हूँ, तो वो पगडंडी अब चौड़ी सड़क बन चुकी है,
जहाँ पहले चरवाहे भैंस लेकर चलते थे, अब गाड़ियाँ दौड़ती हैं।
बचपन के दोस्त अब या तो शहर में हैं या किसी नौकरी में व्यस्त।
लेकिन जब किसी पुरानी कच्ची दीवार को छूता हूँ, तो लगता है जैसे वक्त वहीं ठहर गया है।
गाँव सिर्फ एक जगह नहीं, वो हमारी आत्मा है, हमारी जड़ों का हिस्सा है।
शहर की चमक हमें आकर्षित करती है, लेकिन सुकून तो वहीँ है —
जहाँ खेतों में हवा सरसराती है, जहाँ नदियों में चाँद झलकता है,
और जहाँ हर सुबह अपनेपन की महक लेकर आती है।
अगर आपका भी दिल कभी-कभी गाँव की पगडंडियों में भटक जाता है,
तो समझ लीजिए — आपकी जड़ें अब भी वहीं ज़िंदा हैं।
ज़िंदगी हमें जहाँ भी ले जाए,
पर गाँव की वो मिट्टी, वो महक, वो सुकून —
हमारे दिल से कभी दूर नहीं जा सकती।


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