लेखक: Suresh Kumar
गाँव की ज़िंदगी की बात ही कुछ और होती है। वहाँ की हर पगडंडी, हर पेड़, हर मिट्टी का कण जैसे हमारी यादों का हिस्सा बन जाता है। मेरे गाँव से लगभग एक किलोमीटर की दूरी पर एक बड़ी सी शामलात ज़मीन है। बचपन में हम उसे “बन” कहा करते थे — क्योंकि वहाँ इतने पेड़ और झाड़ियाँ थीं कि सच में वह किसी जंगल से कम नहीं लगता था। ऊँचे-ऊँचे काँटेदार किकर के पेड़, बबूल, नीम, बेर, और कई तरह के झाड़ — सबने मिलकर उस जगह को हरियाली की चादर ओढ़ा रखी थी।
हमारे लिए वो जगह किसी खेल के मैदान से ज़्यादा मायने रखती थी। स्कूल की छुट्टी होते ही हम अपने गाँव के दोस्तों के साथ भैंसों को लेकर उसी कच्चे रास्ते से ‘बन’ की ओर निकल जाते थे। रास्ते में हमारे पैरों के नीचे से मिट्टी उड़ती, और हम सब उस उड़ती धूल में जैसे किसी और ही दुनिया में खो जाते। अब तो वही रास्ता पक्का हो गया है, पर तब की वो मिट्टी, वो धूल — जैसे अपनी खुशबू में बचपन को समेटे रहती थी।
भैंसों के साथ बिताए दिन
हमारे साथ भैंसें भी जैसे हमारी साथी थीं। हम उन्हें जंगल के किनारे ले जाते, जहाँ घास खूब होती और पास ही में बरसात के पानी से बने छोटे-छोटे तालाब। उन तालाबों में हमेशा पानी भरा रहता था, और भैंसें मस्ती में उसमें उतर जातीं। कभी-कभी तो वो पूरा दिन वहीं बितातीं — आधी डूबी, आधी तैरती हुई। उनका वो नज़ारा देखना बड़ा सुकून देता था।
हम अपने सिर पर गमछा बाँध लेते, साथ में एक पानी की बोतल रख लेते। दोपहर की तपती धूप में जब खेतों के बीच से हवा चलती, तो उसका झोंका भी जैसे ठंडक का एहसास देता। अब सोचता हूँ तो लगता है — वो सुख, वो सुकून, वो अपनापन अब किसी एसी कमरे की हवा में कहाँ मिलता है।
कच्चा रास्ता और वो खाई
उस कच्चे रास्ते के साथ-साथ एक लंबी खाई भी बनी हुई थी। बरसात के दिनों में उसमें पानी भर जाता था, और कई बार तो ऊपर तक पानी छप-छप करता दिखता। हमारे घरवाले अक्सर मना करते कि वहाँ मत जाना — लेकिन भला बच्चे कहाँ मानते हैं। हम भैंस की पूँछ पकड़कर पानी में उतर जाते, और उसके साथ-साथ तैरते रहते। ऐसा लगता जैसे किसी झील में मस्ती कर रहे हों।
आज सोचता हूँ तो हँसी आती है, पर तब वो हरकतें हमारी ज़िंदगी का रोमांच थीं।
एक बार तो हमारे गाँव का ही एक लड़का, घास का गट्ठर पानी में बहा दिया था, जो जाकर दूर किसी खेत के पास रुक गया। उसने बड़ा ‘जुगाड़’ लगाया — पहले गट्ठर को बहाया, फिर खुद जाकर उसे दूसरी जगह से निकाल लाया। हमें बड़ा मज़ा आया उसकी समझदारी देखकर। गाँव के बच्चों में भी कितनी सूझबूझ होती थी!
भैंस की पीठ पर सफ़र
कई बार हम भैंस की पीठ पर बैठकर ही जंगल की ओर निकल जाते। भैंस धीरे-धीरे घास चरती, और हम उसकी पीठ पर लेटे-लेटे आसमान देखते। आसमान में उड़ते पंछी, पेड़ों की सरसराहट, और कभी-कभी दूर से आती बैलों की घंटियों की आवाज़ — ये सब मिलकर एक ऐसा संगीत बनाते थे, जो आज भी कानों में गूँजता है। कभी-कभी भैंस अचानक पानी में उतर जाती, और हम आधे भीग जाते। पर हमें क्या परवाह थी! वो भीगना भी तो हमारी मस्ती का हिस्सा था।
शाम की वापसी और वो नज़ारा
शाम होते-होते जब सूरज लाल गोला बनकर ढलने लगता, हम सब भैंसों को लेकर गाँव की ओर लौट पड़ते। कच्चे रास्ते पर एक-एक कर सब गाँव वाले अपनी-अपनी भैंसों को लेकर लौटते थे। ऐसा लगता जैसे कोई छोटा सा मेला लग गया हो। सबके चेहरों पर थकान भी होती, पर मुस्कुराहट भी।
गाँव के मोड़ पर पहुँचते ही कोई कहता —
“आज तो भैंस ने खूब दूध दिया होगा!”
तो कोई हँसकर जवाब देता —
“हाँ, आज तो तालाब में खूब नहाई है!”
शाम के उस समय हवा में मिट्टी की सोंधी खुशबू होती, और दूर कहीं कोई ढोलक की थाप सुनाई देती। वो लम्हे, वो दृश्य आज भी आँखों में ताज़े हैं।
अब वो दिन नहीं रहे...
आज जब उसी रास्ते से गुजरता हूँ तो दिल में एक अजीब सी खालीपन महसूस होती है। वो कच्चा रास्ता अब पक्की सड़क बन गया है, उस धूल की जगह अब डामर की परत है। कभी जिस खाई में पानी छलकता था, अब वो खेत में शामिल हो गए हैं। अब वो भीड़ नहीं दिखती, वो बच्चों की हँसी नहीं गूँजती।
गाँव में अब बस एक-दो लोग ही अपनी भैंसों को लेकर ‘बन’ की ओर जाते हैं। समय ने बहुत कुछ बदल दिया है, लेकिन बचपन की वो यादें — वो अब भी दिल के किसी कोने में धूल की तरह बसी हैं, जिन्हें जितना झाड़ो, उतनी चमक उठती हैं।
वो कच्चा रास्ता अब मिट गया होगा, पर उस पर छोड़े गए हमारे पैरों के निशान आज भी यादों की मिट्टी में गहरे दबे हैं।
आज जब ज़िंदगी के इस सफर में थकान होती है, तो दिल करता है फिर उसी कच्चे रास्ते पर लौट चलूँ —
जहाँ धूल उड़ती थी, पर मन बसता था।
जहाँ भैंसें चरती थीं, पर हम सपने बोते थे।
जहाँ सादगी थी, पर खुशी अपार थी।
क्योंकि —
“वो कच्चा रास्ता सिर्फ मिट्टी का नहीं था, वो हमारे बचपन की किताब का सबसे सुनहरा पन्ना था।”
क्या आपके गाँव में भी ऐसा कोई “कच्चा रास्ता” था, जो अब यादों में ही रह गया है?
फिर चलिए, आज उसी मिट्टी की खुशबू को दिल में बसाते हैं…

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