गर्मियों की छुट्टियों का वो दिन आज भी दिल में ताज़ा है। गाँव की वो लंबी, धूल भरी कच्ची सड़क — जिसके दोनों ओर कतार में लगे जामुन के पेड़ जैसे हमें पुकारते थे — “आओ, फिर से वही बचपन जी लो।”
हम चार-पाँच दोस्त सुबह-सुबह निकल पड़ते थे। जेब में नमक-मिर्च की छोटी सी पुड़िया, एक झोला, सिर पर टोपी और दिल में उत्साह। गर्मी जरूर थी, लेकिन जामुन का लालच उससे कहीं ज़्यादा मीठा था।
जैसे ही हम पहले पेड़ के नीचे पहुँचे, देखा कि काले-नीले जामुन ज़मीन पर बिखरे पड़े थे — कुछ ऐसे जैसे पेड़ ने खुद हमारे लिए तोड़कर फेंके हों।
"चलो जल्दी उठाओ, इससे पहले कोई और आ जाए!" मैंने आवाज़ लगाई, और फिर सब टूट पड़े। कोई झोले में डाल रहा था, कोई सीधे खा रहा था, कोई बीज फेंकते हुए हँस रहा था।
कुछ जामुन ऊपर शाखों पर झूम रहे थे, तो मेरे दोस्त मुनिया ने कहा —
“अरे मुनिया, तू चढ़ जा पेड़ पर! हम नीचे पकड़ लेंगे।”
वो फुर्ती से ऊपर चढ़ गया। पत्तों की सरसराहट और उसकी हरकतों से जामुन झरने लगे — और हमारे बीच गूंज उठी बचपन की ठहाकेदार हँसी।
तभी अचानक पीछे से आवाज़ आई —
“अबे ओ लड़को! नीचे आओ, ये सरकारी पेड़ हैं!”
हम सब चौकन्ने होकर एक-दूसरे की तरफ देखने लगे। फिर देखा — वो तो गाँव का ही हरिया था, जो हँसते हुए हमें छेड़ रहा था।
हमने भी मुस्कुराते हुए जवाब दिया —
“सरकारी पेड़ हैं, पर जामुन तो जनता की मिठास है!”
सभी जोर से हँस पड़े।
थोड़ी देर में हमारी जीभ नीली पड़ गई थी, और हथेलियाँ चिपचिपी। पर क्या मज़ा आया था उस चोरी में!
वापसी में गाँव के नल पर पहुँचकर हमने हाथ-मुँह धोए, और फिर पेड़ों की छाँव में बैठकर नमक-मिर्च छिड़क कर बचे हुए जामुन खाए। हर जामुन के साथ जैसे एक याद भी जी ली हो — बचपन की, दोस्तों की, उस बेफिक्र हँसी की।
वो दिन, वो दोस्त, वो सादगी — आज सोचकर भी चेहरा मुस्करा उठता है।
अब जब कभी सड़क किनारे किसी जामुन के पेड़ को देखता हूँ, तो लगता है जैसे वो पेड़ मुझसे कह रहा हो —
“तेरा बचपन आज भी मेरी शाखों में लटका है…”
क्या आपने भी कभी सड़क किनारे पेड़ों से जामुन तोड़े हैं?
तो जरूर बताइए — कौन-सी याद आज भी आपके साथ चल रही है?
वो जामुन सिर्फ फल नहीं थे, वो हमारे बचपन की मिठास थे — जो अब हर गर्मियों में दिल के किसी कोने में फिर से पकने लगती है।


Nice Story Sir
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