आज पहली बार ब्लॉग लिखने की कोशिश कर रहा हूँ। मन में कई सवाल उठ रहे हैं – लिखने के लिए विचार कहाँ से आएंगे? अगर आज लिख दिया, तो कल क्या लिखूँगा? ऐसे ही सवाल कभी-कभी डर पैदा कर देते हैं। लेकिन मैंने तय किया है कि कल की चिंता कल करेंगे, आज तो लिखते हैं।
दोस्तों, मेरा नाम सुरेश कुमार है, लेकिन मेरे ज्यादातर दोस्त मुझे शर्मा कहकर ही बुलाते हैं। कई तो ऐसे भी हैं जिन्हें शायद मेरा असली नाम तक नहीं पता होगा।
मैं पेशे से जीवन बीमा एजेंट हूँ। 2011 में मैंने बीमा की एजेंसी शुरू की थी और अब चंडीगढ़ में रहता हूँ। लेकिन मेरी जड़ें हरियाणा के अंबाला जिले के गाँव सोँटा से जुड़ी हैं।
बचपन और पढ़ाई
मेरे परिवार में पिता जी, माता जी, दो बहनें और एक छोटा भाई हैं। आठवीं तक मैंने गाँव के ही प्राइवेट स्कूल में पढ़ाई की। उसके बाद 9वीं और 10वीं की पढ़ाई गाँव के सरकारी स्कूल से की। लेकिन हमारे गाँव में 10वीं तक ही स्कूल था, इसलिए 11वीं-12वीं मुझे पास के गाँव ठोल जाकर करनी पड़ी।
घर की आर्थिक स्थिति बहुत मजबूत नहीं थी, इसलिए बार-बार यही सुनने को मिलता था कि "पढ़ाई जल्दी पूरी करो और घर की जिम्मेदारी संभालो।" आगे की पढ़ाई का मन था, पर हालात ने इजाज़त नहीं दी।
गाँव से शहर का सफर
उसके बाद मेरे जीजा जी, जो चंडीगढ़ में एक अखबार के दफ्तर में गाड़ी चलाते थे, मुझे अपने पास ले आए। वहीं उन्होंने मुझे नौकरी भी लगवा दी।
तब तक मैंने कंप्यूटर की थोड़ी-बहुत पढ़ाई अम्बाला जाकर की थी। उस दौर के कई मजेदार किस्से आज भी याद आते हैं, जिन्हें सोचकर मैं अपने आप हँस पड़ता हूँ। कभी विस्तार से जरूर लिखूँगा।
2013 में जब मैं चंडीगढ़ आया, तो मेरी तनख़्वाह सिर्फ 1000 रुपये थी। वहीं रहना, दफ्तर की देखभाल करना और काम सीखना – सब कुछ उसी पैकेज में शामिल था। दो महीने बाद तनखाह बढ़कर 2000 रुपये हो गई तो खुशी का ठिकाना नहीं रहा।
पहली कमाई और घर की याद
रविवार की छुट्टी पर मैं घर चला जाता था। उस वक्त मुझे ऐसा लगता था जैसे कोई फौजी ड्यूटी से घर लौटा हो। लेकिन सोमवार को जब फिर से चंडीगढ़ लौटना पड़ता, तो आँखें भर आती थीं। बस में बैठकर अक्सर रो भी पड़ता।
गाँव से बाहर रहना मेरे लिए किसी विदेश जाने जैसा था। क्योंकि मैंने कभी घर से दूर रहकर जीवन नहीं जिया था।
धीरे-धीरे चार साल निकल गए। इस बीच समझ आया कि कमाने के लिए घर से दूर रहना ही होगा।
सम्मान और खुशी
हालाँकि चंडीगढ़ हमारे गाँव से सिर्फ 90 किलोमीटर दूर है, लेकिन गाँव के लोग इसे बहुत बड़ी बात मानते थे। अगर कोई चंडीगढ़ में नौकरी करता था तो उसे इज्ज़त से देखा जाता था।
मुझे भी गर्व होता था कि अभी शादी नहीं हुई थी और मैं खुद कमाने लगा था। उस समय 3000 रुपये की तनखाह भी परिवार के लिए बड़ी राहत थी। सबको संतोष था कि अब घर का बेटा कमाने लगा है।
आज उस बात को 15 साल हो गए हैं। पीछे मुड़कर देखता हूँ तो लगता है कि हर छोटा संघर्ष, हर छोटी खुशी और हर याद मेरी ज़िंदगी का सबसे बड़ा खजाना है।
👉 यही मेरी कहानी का शुरुआती सफर है। आने वाले ब्लॉग्स में मैं और भी किस्से आपसे साझा करूँगा – खासकर कंप्यूटर सीखने के दिनों के मजेदार अनुभव और जीवन बीमा एजेंट बनने की यात्रा।

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