कई साल बाद, ज़िंदगी ने फिर एक मौका दिया, एक दोपहर, एक मैच का दिन।
आज ज़िंदगी का एक ऐसा दिन सामने आया, जिसे बीते हुए कई साल हो गए थे। गर्मी के दिनों में पसीना छुड़वाने वाली तेज धूप से बाहर निकलने का मन ही नहीं करता था। लेकिन आज, दोपहर बारह बजे के आसपास, काले बादलों ने सूरज को अपने आगोश में ले लिया। तेज धूप की आग बरसाती किरणें कुछ देर के लिए थम गईं। हवा ने भी अपना रुख बदला और उसकी गति तेज हो गई, जिसने जल्द ही एक आँधी का रूप ले लिया।
घर के बाहर रस्सियों पर सूखने के लिए टांगे गए कपड़े उड़ने लगे, तो सभी ने अपने-अपने घर के बाहर से कपड़े उतार लिए। कुछ बच्चों ने लिफाफे को रस्सी से बांधकर पतंग की तरह हवा में उड़ाना शुरू कर दिया। वे खुशी से अपने पतंग रूपी लिफाफों को उड़ा रहे थे, और उनके बीच उनकी डोरों के उलझने से छोटी-मोटी लड़ाई भी हो गई, जिसे समझा-बुझाकर शांत किया गया।
थोड़ी देर बाद, मेरा भांजा खुशी-खुशी मेरे पास आया और बोला, “चलो, मैच खेलने चलते हैं।” क्रिकेट मेरा पसंदीदा खेल था, जिसे हम बचपन में खूब खेला करते थे। धूप-छांव, गर्मी-सर्दी, यहाँ तक कि बरसात भी हमें इस खेल से रोक नहीं सकती थी। हमारे लिए तो बस खेलना ही सब कुछ था। खेतों में तीन डंडे गाड़कर या ईंटें रखकर हम विकेट बना लेते थे। आज फिर वही दिन लौट आया, पर वो साथी नहीं थे। सभी अपने-अपने कामों में व्यस्त हो गए थे।
आज मुझे भी लगभग 15-16 साल बाद क्रिकेट खेलने का मौका मिला। हम छह लोग थे जो मैच खेलने उतरे। पास के खेत में बरसात का पानी सूख चुका था, बस कहीं-कहीं थोड़ी नमी रह गई थी। सभी डंडे, बैट और गेंद लेकर पिच बनाने की तैयारी करने लगे। खेत में गोबर वाली खाद बिखरी होने के कारण अच्छी जगह नहीं मिल रही थी। हम सभी ने मिलकर उस जगह को थोड़ा सा साफ किया और पिच बना दी। तीन-तीन की दो टीमें तैयार हो गईं और चार-चार ओवर के मैच खेलने की तैयारी होने लगी।
जब हम अपनी-अपनी पोजीशन संभालने लगे, तो ऐसा लगा जैसे वो पुराने दिन वापस आ गए हों। लेकिन पुराने दोस्तों की कमी बहुत खल रही थी। पहले मैच खेलने के लिए हम सब समय से इकट्ठे हो जाते थे और इसके लिए घर वालों से डांट भी खानी पड़ती थी। आज समय की कमी के कारण हम सिर्फ तीन ही मैच खेल पाए। धीरे-धीरे गर्मी फिर से बढ़ने लगी थी।
मैच के दौरान वही पुरानी स्थितियाँ बन रही थीं—एक-दूसरे से उलझ जाना, गलत फैसले पर अंपायर से झगड़ा करना। आज के मैच में हम सिर्फ छह लोग थे, इसलिए हमने फील्डिंग भी सामूहिक रूप से की और कोई अंपायर भी नहीं था। विकेटकीपिंग, बैटिंग और बॉलिंग सब खुद ही करनी पड़ रही थी। बॉलर को ही फील्डिंग करके दूर से गेंद उठाकर लानी पड़ती थी।
मैच खेलते-खेलते वहाँ कई बच्चे इकट्ठे हो गए थे, जिन्हें गर्मी से थोड़ी राहत मिली थी और वे बाहर खेलने का मौका पा गए थे। उन्हें मैदान से बाहर जाने के लिए चिल्लाते-चिल्लाते गला भी दुखने लगा। मैं उन्हें बाहर जाने के लिए जोर-जोर से बोल रहा था, पर बच्चे किसी की नहीं सुन रहे थे।
मैंने अपने फोन में समय देखा तो साढ़े तीन बज चुके थे। अब मुझे अपने पशुओं को चारा डालने जाना था। थोड़ी और देर हो जाती तो माँ से डांट सुननी पड़ सकती थी। इसलिए हम सभी अपना बैट, गेंद और डंडे उठाकर अपने-अपने घरों को चल दिए।
आज मैच खेलकर ऐसा लगा जैसे कई साल बाद फिर से वही दिन लौट आए हों, पर पुराने दोस्तों की कमी से यह अधूरा-अधूरा सा लग रहा था। थोड़ी-बहुत संतुष्टि के साथ हम सभी अपने घरों को लौट आए।

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