गाँव-कस्बों की रामलीलाओं का रंग कुछ और ही होता है। शहरों में जहाँ मंचन बड़े-बड़े सेट और तकनीक के सहारे होता है, वहीं गाँवों की रामलीला में सादगी, अपनापन और दर्शकों की भागीदारी ही इसकी असली पहचान है। यहाँ केवल रामकथा ही नहीं होती, बल्कि किस्से-कहानियाँ, शरारतें और हंसी-ठिठोली भी शामिल हो जाती हैं। ऐसी ही एक मज़ेदार घटना सीता स्वयंवर के दृश्य से जुड़ी है।
🎭 सीता स्वयंवर का मंचन
रामलीला का सबसे लोकप्रिय और रोमांचक दृश्य होता है सीता स्वयंवर। इसमें राजा जनक के दरबार में धनुष यज्ञ का आयोजन होता है। शर्त होती है कि जो वीर शिवधनुष को उठाकर तोड़ेगा, वही सीता से विवाह कर सकेगा। सभी बड़े-बड़े राजा प्रयास करते हैं, लेकिन असफल हो जाते हैं। अंत में भगवान श्रीराम धनुष उठाकर सहजता से तोड़ देते हैं।
😜 शरारत की शुरुआत
कहते हैं, एक बार उत्तर प्रदेश के एक कस्बे में रामलीला हो रही थी। अब गाँव की रामलीला में तो हर कोई जुड़ा होता है—कभी दर्शक, कभी कलाकार और कभी शरारती भीड़। उसी दौरान किसी शरारती ने नाटक में नकली लकड़ी के धनुष की जगह असली लोहे का भारी धनुष रख दिया। उसका इरादा यही था कि जब श्रीराम की भूमिका निभाने वाला लड़का धनुष उठाने में असफल होगा, तो मंच पर हंसी का माहौल बन जाएगा और उसकी बेइज्जती हो जाएगी।
💪 श्रीराम का कमाल
जब श्रीरामचंद्र जी मंच पर आए और उन्होंने धनुष उठाने का प्रयास किया, तो उन्हें तुरंत आभास हुआ कि यह कोई साधारण नकली धनुष नहीं है, बल्कि लोहे का असली और भारी धनुष है। उन्होंने क्षणभर के लिए निर्देशक की ओर प्रश्न भरी निगाहों से देखा। निर्देशक भी तुरंत समझ गए कि अवश्य ही किसी शरारती ने यह खेल किया है।
निर्देशक के मन में चिंता घर कर गई, क्योंकि यदि यह दृश्य असफल हो जाता, तो पूरी रामलीला उपहास का पात्र बन सकती थी। उन्होंने मन ही मन भगवान से प्रार्थना की—
"हे प्रभु, आज की यह रामलीला आपके चरणों में अर्पित है। यह परीक्षा हमारी नहीं, आपकी है। यदि यहाँ असफलता होती है, तो यह हमारी बेइज्जती नहीं, आपकी कथा का अपमान होगा। कृपा कीजिए और इस मंचन को सफल बनाने में हमारी सहायता कीजिए।"
निर्देशक की इस प्रार्थना के साथ ही मानो साक्षात रामचंद्र जी के रूप में मंच पर उपस्थित कलाकार को अद्भुत शक्ति प्राप्त हो गई।
जब दृश्य शुरू हुआ और श्रीराम के किरदार में कलाकार मंच पर आया, तो सबकी निगाहें उसी पर टिक गईं। सभी सोच रहे थे कि अब असली मज़ा आएगा। लेकिन हुआ इसके बिल्कुल उलट! उसने अपने पूरे आत्मविश्वास और सामर्थ्य के साथ उस लोहे के भारी धनुष को उठाया और पलभर में उसे तोड़कर रख दिया।
दर्शकों की आँखें फटी की फटी रह गईं। मंच पर तालियों और शोर से पूरा माहौल गूंज उठा। लोग हँसते हुए कहने लगे—
“अरे ये तो सचमुच रामजी ही लग रहे हैं।”
“जिसे बेइज्जती समझा था, वही तो सम्मान बन गया!”
😂 मज़ाक से यादगार तक
उस दिन का दृश्य इतना अनोखा और मज़ेदार बन गया कि वर्षों तक लोग उसे याद करके हँसते और सुनाते रहे। यहाँ तक कि गाँव के बुजुर्ग कहते थे—
“भाई, उस साल की रामलीला तो असली बन गई थी।”
यह किस्सा दिखाता है कि गाँव की रामलीलाओं में सिर्फ नाटक ही नहीं होता, बल्कि हर दृश्य में एक सच्चा अपनापन और ज़िंदगी का रस छुपा होता है।
सीता स्वयंवर का यह मज़ेदार किस्सा सिर्फ एक घटना नहीं, बल्कि यह प्रमाण है कि कला और परंपरा में जब सादगी और सच्चाई जुड़ जाती है, तो वह पीढ़ियों तक याद रहती है। यह किस्सा हमें यह भी सिखाता है कि कई बार शरारत भी अप्रत्याशित रूप से सम्मान का कारण बन जाती है।

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