गाँव की रामलीला का अपना ही मज़ा होता है। शहरों में जहाँ बड़े-बड़े मंच, लाइटें और आधुनिक तकनीक दिखती है, वहीं गाँव की रामलीला में सादगी, अपनापन और हंसी-ठिठोली का अलग ही रंग होता है। यही कारण है कि साल भर गाँव वाले इस का इंतज़ार करते हैं। इस बार भी जब चाची ताड़का का वध होना था, तो छोटे-बड़े, बच्चे-बूढ़े, महिलाएँ—सबके चेहरे पर उत्सुकता साफ झलक रही थी।
🎭 मंच पर ताड़का का प्रवेश
जैसे ही मंच पर ताड़का (हमारे गाँव का ही एक लड़का) प्रकट हुआ, पूरा मैदान तालियों और हंसी से गूंज उठा। सिर पर लंबा सा नकली बालों का झूड़ा, चेहरे पर भयंकर-सा मेकअप और हाथ में पेट्रोल की बोतल—बस देखते ही बनता था। एक हाथ में जलती मशाल और दूसरे हाथ से पेट्रोल फूँकते ही जब आग लपट मारकर दूर तक गई, तो भीड़ ने ‘वाह-वाह’ करके उसका उत्साह बढ़ा दिया। बच्चे तो खुशी से उछल पड़े, जैसे असली राक्षस उनके सामने आ गया हो।😂 हंसी-ठिठोली और मज़ाक
इस दृश्य की असली मज़ेदार बात ये होती है कि राक्षसों की टोली मंच पर खूब हंसी-मज़ाक करती है। कोई सीटी बजाता है, तो कोई अजीब-अजीब हरकतें करता है। यहाँ तक कि कभी-कभी ताड़का खुद ही हंसी रोक नहीं पाता और बीच-बीच में हँस पड़ता है। लेकिन यही तो गाँव की रामलीला की खूबसूरती है—सच्चाई और अभिनय का मिश्रण।
🏹 श्रीराम और लक्ष्मण का तीर
अब आया सबसे रोमांचक पल—श्रीराम और लक्ष्मण का ताड़का से युद्ध। मंच पर जैसे ही तीर चलने लगे, लोग मंत्रमुग्ध हो गए। लेकिन हंसी तब फूट पड़ी जब ताड़का बार-बार तीर से बच जाता। रामजी बाण छोड़ते और ताड़का मज़ाक में ‘अबे मैं तो बच गया’ कहकर इधर-उधर भाग जाता। दर्शकों की तालियाँ और ठहाके रुकने का नाम नहीं ले रहे थे।
🤭 पर्दे के पीछे का किस्सा
पुराने कलाकार बताते हैं कि एक बार तो ताड़का का किरदार निभाने वाले ने मरने से ही मना कर दिया था। श्रीराम चाहे जितना तीर चलाएँ, वह बार-बार उठकर खड़ा हो जाता। काफी देर समझाने-बुझाने के बाद आखिरकार उसने लम्बी चीख मारी और धड़ाम से ज़मीन पर गिर पड़ा। फिर तो मंच पर बने छोटे-छोटे राक्षस बच्चे रोने-धोने का अभिनय करते हुए दौड़े और उसे “अंतिम संस्कार” के लिए उठाकर ले गए। यह दृश्य इतना मज़ेदार बन गया कि आज भी उसे याद करके सब ठहाके लगाते हैं।
👏 ताड़का का सम्मान
जब मंच का यह नज़ारा खत्म हुआ, तो दर्शकों ने ताड़का का किरदार निभाने वाले हमारे दोस्त को घेर लिया। सबने उसकी पीठ थपथपाई और शाबाशी दी। यह दृश्य साबित करता है कि गाँव की रामलीला सिर्फ धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि हंसी, भाईचारा और यादों का उत्सव है।
गाँव की रामलीला का हर दृश्य दिल में गुदगुदी और श्रद्धा दोनों भर देता है। चाची ताड़का का वध दृश्य तो हर साल का खास आकर्षण होता है। इसमें डर नहीं, बल्कि मज़ाक और अपनापन ज़्यादा होता है। यही वजह है कि सालों बाद भी जब इन किस्सों को याद करते हैं, तो हँसी अपने आप छूट जाती है।
दोस्तों, अगर आपको भी कभी गाँव की रामलीला देखने का मौका मिले, तो इसे बिल्कुल न चूकें। ये नाटक सिर्फ रामकथा का मंचन नहीं, बल्कि गाँव की संस्कृति, एकता और हंसी-ठिठोली का खजाना है। अगली बार आप भी अपने गाँव की रामलीला का कोई मज़ेदार किस्सा ज़रूर साझा कीजिएगा। 🙏

No comments:
Post a Comment