गाँव की वो ठंडी और ओस भरी सुबहें आज भी जेहन में ताजा हैं, जब मैं अपने ताया जी के साथ खेतों की ओर निकल पड़ता था। माँ ने हाथ में रोटी-नमक और प्याज थमा दिया होता, और ताया जी अपनी लाठी उठाए हुए खेत की पगडंडी पर चलते जाते। मैं उनके पीछे-पीछे, नंगे पाँव ओस से भीगी घास पर चलता हुआ, खेत की मिट्टी से जुड़ने लगता।
हमारा खेत गाँव के बाहर, नीम और आम के पेड़ों से घिरा हुआ था। वहाँ भिंडी, टमाटर, बैंगन, और हरी मिर्च की कतारें लहराती रहतीं। सूरज धीरे-धीरे उगता, और हम दोनों खेत में झुककर सब्ज़ियाँ तोड़ने लगते। ताया जी हर पौधे को इस तरह देखते मानो वह उनका अपना बच्चा हो। “ध्यान से तोड़ो बेटा, पौधा न टूटे,” वे हमेशा समझाते।
मैं सब्ज़ियाँ बटोरता, टोकरी में भरता, और ताया जी उन्हें बैलगाड़ी पर लादते। फिर वे सब्ज़ियाँ लेकर पास के कस्बे की मंडी में चले जाते बेचने। मैं खेत में रुककर कभी मिट्टी से खेलता, कभी कुएं पर पानी खींचता, या छांव में बैठकर रोटी खा लेता।
शाम को जब ताया जी लौटते, उनके चेहरे पर थकावट जरूर होती, लेकिन एक संतोष भी झलकता। वे मुझसे कहते, “देखा, अपने खेत की मेहनत मंडी तक जाती है।” तब मैं समझता कि मिट्टी से कमाया हुआ अनाज और सब्ज़ी सबसे कीमती होती है।
आज शहर की भीड़ में रहते हुए जब भी सब्ज़ी खरीदता हूँ, तो उस खेत की सौंधी मिट्टी, ताया जी की मेहनत और मंडी की वो खुशबू याद आ जाती है। जीवन के असली स्वाद तो उन्हीं दिनों में थे, जब हर सब्ज़ी के पीछे एक कहानी और हर पसीने की बूँद में अपनापन छुपा होता था।
अगर आपको भी अपनी बचपन की खेत की यादें छू गई हों, तो ज़रूर बताइए। क्या आपने कभी अपने ताया जी या दादा जी के साथ खेत में समय बिताया है?

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