इस दुनिया में शायद ही कोई ऐसा इंसान होगा जो अपने बचपन को भूलना चाहे। बचपन ज़िंदगी का वह खूबसूरत हिस्सा होता है, जहाँ न भविष्य की चिंता होती है और न ही जिम्मेदारियों का बोझ। उस समय हम बड़े होने के सपने देखते हैं, सोचते हैं कि कब स्कूल से छुटकारा मिलेगा, कब माता-पिता की डांट से आज़ादी मिलेगी। लेकिन जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है, एहसास होता है कि ज़िंदगी के सबसे खूबसूरत और बेफिक्र दिन तो वही थे, जो बचपन में बीत गए।
आज जब पीछे मुड़कर देखता हूँ, तो लगता है कि बचपन किसी सुनहरी कहानी की तरह था, जो कब शुरू हुई और कब खत्म हो गई, पता ही नहीं चला।
घर के आँगन में जहाँ थोड़ी-सी भी खाली जगह मिल जाती थी, हम उसे खेल का मैदान बना लेते थे। ज़मीन में छोटा-सा गड्ढा खोदकर कंचे खेलने बैठ जाते थे। कंचों की छोटी-छोटी बोतलें और डिब्बियाँ भरना किसी खज़ाने को इकट्ठा करने जैसा लगता था। हर नया कंचा जीतने पर जो खुशी मिलती थी, वह आज किसी बड़ी चीज़ को खरीदने पर भी नहीं मिलती।
गाँव के नीम के पेड़ हमारे खेलों के साथी हुआ करते थे। उनकी शाखाओं पर चढ़कर "पील पलंगड़ा" खेलना, एक डाल से दूसरी डाल पर कूदना और फिर शाम तक वहीं मस्ती करना आम बात थी। उस समय न गिरने का डर होता था और न चोट लगने की चिंता। बस खेल ही हमारी दुनिया हुआ करता था।
हमारे खेल भी कितने अनोखे हुआ करते थे—गुल्ली-डंडा, खो-खो, पकड़म-पकड़ाई, लुक-मचाई, ऊँच-नीच, कंचे और पुराने साइकिल के टायर को डंडे से घुमाते हुए पूरे गाँव की गलियों में दौड़ना। उन खेलों के नाम भी आज सुनकर मुस्कान आ जाती है।
"लुकजो-छिपजो कनक का दाणा, टोहा न पाणा..."
यह पंक्ति सुनते ही जैसे पूरा बचपन आँखों के सामने घूम जाता है। आज के बच्चों ने शायद इन खेलों के नाम भी नहीं सुने होंगे, क्योंकि उनकी दुनिया मोबाइल और वीडियो गेम तक सिमट कर रह गई है।
गाँव की लड़कियाँ भी अपने अलग खेल खेलती थीं। किकली डालना, गीत गाना, गीटे खेलना और घंटों तक हँसते-खेलते रहना उनके बचपन की पहचान थी। पूरा गाँव जैसे बच्चों की हँसी से गूंजता रहता था।
दोपहर की गर्मी भी हमें घर में नहीं रोक पाती थी। माँ बार-बार आवाज़ लगाती थीं कि धूप बहुत तेज़ है, बाहर मत जाओ, लेकिन जैसे ही उन्हें नींद आती, हम फिर से बाहर खेलने निकल पड़ते। उस समय धूप भी जैसे हमारी दोस्त हुआ करती थी।
बरसात का मौसम तो हमारे लिए किसी त्योहार से कम नहीं होता था। गाँव के जोहड़ पानी से लबालब भर जाते थे। हम खेतों की मेड़ों पर दौड़ते, अमरूद तोड़ने निकल जाते और कीचड़ में फिसल-फिसलकर हँसते रहते।
भैंसों को पानी पिलाने के लिए जोहड़ में ले जाना भी किसी रोमांच से कम नहीं था। कई बार उनकी पीठ पर बैठकर पानी में उतर जाते और खुद भी तैरने लगते। जिस पानी में भैंसें नहाती थीं, उसी में हम भी घंटों मस्ती करते रहते।
बरसात के दिनों में एक और डर साथ चलता था—जोंक का। कई बार जोंक टांगों से चिपक जाती थी। तब जेब में रखा नमक काम आता था। नमक डालते ही जोंक छूट जाती और हम फिर से खेल में लग जाते।
स्कूल से छुट्टी होने के बाद भैंसों को चराने ले जाना भी रोज़मर्रा का हिस्सा था। रास्ते में जामुन के पेड़ मिलते तो उन पर चढ़कर जामुन तोड़ना शुरू कर देते। कई बार बड़े-बुज़ुर्ग डराते थे कि जामुन के पेड़ पर भूत रहता है। हम भी कुछ देर के लिए डर जाते, लेकिन जामुन खाने का लालच डर से बड़ा होता था।
आज सोचता हूँ तो लगता है कि शायद खेतों के मालिक बच्चों को पेड़ों पर चढ़ने से रोकने के लिए ऐसी कहानियाँ बनाया करते थे।
आँधी और तूफान भी हमारे लिए किसी रोमांच से कम नहीं होते थे। जैसे ही तेज़ हवा चलती, गाँव के बच्चे सड़क पर दौड़ पड़ते। आँधी में किक्कर और अन्य पेड़ों की सूखी लकड़ियाँ टूटकर गिरती थीं। हम उन्हें इकट्ठा करके घर लाते थे। जिस दिन ज्यादा लकड़ियाँ मिल जातीं, उस दिन घर वालों से शाबाशी भी मिलती थी।
गाँव के कच्चे घरों की अपनी अलग कहानी थी। बरसात शुरू होते ही छतों से पानी टपकना आम बात थी। घर में बाल्टियाँ, डोलू और बर्तन रख दिए जाते थे ताकि पानी फर्श पर न फैले। कई बार बारिश के बीच ही छत पर चढ़कर उस जगह को मिट्टी से बंद करना पड़ता था, जहाँ से पानी अंदर आ रहा होता था।
आज भी गाँवों में कुछ कच्चे घर हैं, जहाँ बारिश आने से पहले छतों पर नया गारा लगाया जाता है। यह परंपरा अब भी कहीं-कहीं ज़िंदा है।
छुट्टी वाले दिन तो जैसे समय का कोई हिसाब ही नहीं होता था। सुबह घर से निकलते और दोपहर को सिर्फ खाना खाने आते। फिर शाम तक खेलते रहते। न मोबाइल था, न इंटरनेट और न ही किसी तरह की चिंता। खुशियाँ छोटी थीं, लेकिन दिल बहुत बड़ा था।
आज जब ज़िंदगी जिम्मेदारियों, काम और भागदौड़ में उलझ गई है, तब अक्सर मन उन दिनों में लौट जाना चाहता है। उन दिनों में जहाँ न कोई तनाव था, न कोई जल्दबाज़ी। सिर्फ दोस्त थे, खेल थे, बारिश थी, खेत थे और ढेर सारी मासूम खुशियाँ थीं।
बचपन एक ऐसा खज़ाना है, जिसकी कीमत हमें उसके बीत जाने के बाद समझ आती है। उसकी यादें उम्र भर हमारे साथ रहती हैं और जीवन की कठिन राहों में मुस्कुराने का बहाना बनती हैं।
मैं अपने बचपन को कभी नहीं भूल सकता। उसकी हर याद आज भी मेरे दिल में वैसे ही बसी हुई है जैसे किसी पुराने संदूक में रखी अनमोल धरोहर। सच कहूँ तो बचपन की यादें इतनी हैं कि उन्हें एक लेख में समेटना संभव ही नहीं।
बाकी यादें फिर कभी साझा करेंगे...
क्योंकि बचपन की कहानी कभी खत्म नहीं होती, वह तो उम्र भर हमारे साथ चलती रहती है।

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