ये उन दिनों की बात है जब ज़िंदगी बहुत सरल थी और खुशियाँ बहुत छोटी-छोटी बातों में मिल जाती थीं। स्कूल जाना उस समय कभी बोझ लगता था, तो कभी वही जगह हमारी सबसे प्यारी दुनिया बन जाती थी। आज जब पीछे मुड़कर देखते हैं, तो एहसास होता है कि असल में वही दिन सबसे खूबसूरत थे—मासूमियत से भरे, बिना किसी चिंता के।
वो समय ऐसा था जब हर सुबह स्कूल जाने का मन नहीं करता था। अक्सर यही सोचते थे कि काश आज छुट्टी हो जाए। लेकिन जैसे ही नए सत्र की शुरुआत होती, सब कुछ बदल जाता। नई क्लास में जाना, नई किताबों की खुशबू, नया बस्ता—सब कुछ मन को खुश कर देता था।
आज के बच्चों के जैसे चमकदार और महंगे बैग नहीं होते थे, बल्कि साधारण सा बस्ता होता था, जो अक्सर खेतों में खाद डालने वाले थैले से घर पर ही सिल दिया जाता था। कई बार तो उसे हम खुद ही सिल लेते थे। उस सफेद जूट जैसे झोले पर नीले और लाल पेन से डिजाइन बनाना, अपना नाम लिखना—वो अपनी ही बनाई हुई पहचान होती थी, ताकि बस्ता कहीं खो न जाए।
नई किताबों की खुशबू जैसे मन में बस जाती थी। उन्हें बार-बार खोलकर देखना, पन्ने पलटना—एक अलग ही खुशी होती थी। लेकिन कई बार स्याही की दवात से स्याही निकलकर बस्ते में फैल जाती, और फिर वही बस्ता अपने आप में एक नई कला बन जाता था। किताबें भी उस स्याही से रंग जातीं, लेकिन तब वो खराब नहीं लगती थीं, बल्कि अपनी ही बनाई हुई कहानी जैसी लगती थीं।
जैसे-जैसे दिन बीतते, पढ़ाई से मन भी धीरे-धीरे हटने लगता। कभी बुखार का बहाना बनाकर छुट्टी कर लेते, तो कभी किसी शादी में जाने का मौका मिल जाता। गांव की जिंदगी में तो एक खास बात ये भी थी कि अगर किसी के घर शादी होती और बारात को स्कूल में ठहराया जाता, तो स्कूल में चारपाइयाँ लगनी शुरू हो जातीं। बस, वही इशारा होता था कि कल छुट्टी पक्की है। उस समय ये छोटी-छोटी बातें ही हमारी सबसे बड़ी खुशियाँ होती थीं।
स्कूल का समय सिर्फ पढ़ाई तक सीमित नहीं था, बल्कि दोस्ती और शरारतों से भी भरा होता था। हर किसी के अपने दोस्त होते थे, मेरे भी थे। दसवीं क्लास में एक छोटा सा झगड़ा मेरे दोस्त अनिफ अली से हो गया। बात बहुत छोटी थी, लेकिन उस दिन के बाद हम दोनों ने एक-दूसरे से बात करना बंद कर दिया। आज भी जब कभी मिलते हैं, तो कभी-कभी बात हो जाती है, लेकिन वो पहले वाली दोस्ती फिर कभी नहीं लौटी।
ऐसा ही एक और दोस्त था—सलीम। उसके साथ भी छोटी सी बात पर झगड़ा हो गया और बातचीत बंद हो गई। आज भी कभी-कभी मिलते हैं, तो हाल-चाल पूछ लेते हैं, लेकिन वो बचपन वाली बात अब नहीं रही।
ये सब छोटी-छोटी बातें थीं, जिनका कोई बड़ा मतलब नहीं था, लेकिन उस समय हमारे लिए वही सब कुछ थीं।
आज जब उन दिनों को याद करते हैं, तो मन उसी दौर में वापस चला जाता है। वो स्कूल की घंटी, दोस्तों की हंसी, छुट्टी का इंतजार—सब कुछ आंखों के सामने ताजा हो जाता है। कभी-कभी दिल करता है कि काश फिर से वही स्कूल के दिन लौट आएं, वही मासूमियत, वही बेफिक्री फिर से जीने को मिल जाए।
ज़िंदगी आगे बढ़ती रहती है, लेकिन कुछ यादें हमेशा हमारे साथ चलती हैं। स्कूल के वो दिन भी उन्हीं खूबसूरत यादों में से एक हैं, जो हमें हर बार मुस्कुराने की वजह देते हैं।
आज भले ही हम बड़े हो गए हों, जिम्मेदारियों में उलझ गए हों, लेकिन दिल के किसी कोने में आज भी एक बच्चा बैठा है—जो फिर से स्कूल की उस दुनिया में लौटना चाहता है।

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