गाँव के बाहर एक छोटा-सा आश्रम था। वहाँ रहने वाले संत हरिदास जी सादगी और भक्ति के लिए जाने जाते थे। उनके आश्रम में दूर-दूर से लोग शांति और समाधान की तलाश में आते थे। आश्रम के पास ही एक नदी बहती थी, जहाँ से आश्रम के सभी लोग पानी भरकर लाते थे।
एक दिन गाँव का युवक मोहन संत हरिदास जी के पास आया। उसके चेहरे पर बेचैनी साफ़ झलक रही थी। उसने कहा,
“बाबा, मैं हरि भजन करना चाहता हूँ। इस संसार से मन ऊब गया है। सब छोड़कर भक्ति के मार्ग पर चलना चाहता हूँ।”
हरिदास जी मुस्कराए, पर कुछ बोले नहीं। उन्होंने मोहन को एक मटका थमाया और कहा,
“पहले नदी से जल भर लाओ।”
मोहन जल लेने चला गया। रास्ते में उसने देखा कि कुछ लोग झगड़ रहे हैं। उसने उन्हें समझाया। थोड़ी दूर आगे गया तो किसी बूढ़ी औरत को सहारा देकर नदी तक पहुँचाया। नदी किनारे पहुँचा तो किसी का बच्चा फिसल गया था, मोहन ने उसे बचाया। पानी भरते-भरते शाम हो गई।
जब वह लौटकर आया तो थका हुआ था, पर उसके चेहरे पर अजीब-सी शांति थी।
हरिदास जी ने पूछा,
“जल मिल गया?”
मोहन बोला,
“हाँ बाबा, पर पता ही नहीं चला कि रास्ते में इतना कुछ हो जाएगा।”
हरिदास जी ने धीरे से कहा,
“बेटा, यही है — लेने गए थे जल, और सारा संसार बस गया।”
कुछ दिन बाद मोहन ने फिर कहा,
“अब मैं हरि भजन करना चाहता हूँ।”
हरिदास जी ने उसे आश्रम में कपास ओटने का काम दे दिया। मोहन मन ही मन सोचने लगा — मैं तो भक्ति के लिए आया था, और ये काम?
लेकिन उसने कुछ कहा नहीं।
दिन बीतते गए। कपास ओटते-ओटते उसके मन में धैर्य आया, विचार साफ़ होने लगे। हाथ काम में रहते और मन अपने आप हरि नाम में लगने लगा। उसे समझ आने लगा कि भक्ति केवल आँख बंद करके बैठने का नाम नहीं है।
एक दिन मोहन ने स्वयं कहा,
“बाबा, अब समझ आया। मैं हरि भजन को आया था, लेकिन कपास ओटते-ओटते मन शुद्ध हो गया।”
हरिदास जी की आँखों में संतोष था। उन्होंने कहा,
“इसीलिए तो कहा जाता है — गए थे हरि भजन को, ओटन लगे कपास।
कभी-कभी हम जो सोचकर निकलते हैं, जीवन हमें वही नहीं देता, बल्कि वही देता है जिसकी हमें ज़रूरत होती है।”
मोहन अब वही व्यक्ति नहीं रहा था जो बेचैन होकर आश्रम आया था। वह समझ चुका था कि संसार से भागना नहीं, बल्कि संसार में रहते हुए सही कर्म और सच्ची भावना से जीना ही असली भक्ति है।
सीख (भाव):
ज़िंदगी में कई बार हम किसी एक उद्देश्य से निकलते हैं,
पर रास्ते में अनुभव, जिम्मेदारियाँ और कर्म हमें भीतर से बदल देते हैं।
यही परिवर्तन ही असली साधना है।


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