कुछ यात्राएँ सिर्फ सफ़र नहीं होतीं, वे मन में एक ऐसी छाप छोड़ जाती हैं जो सालों तक ताज़ा रहती है। इस बार गीता जयंती पर मेरा ऐसा ही अनुभव रहा, जब मैं अपने दोस्तों — सुरेन्दर और सुचा — के साथ कुरुक्षेत्र पहुँच गया। हमने तय किया कि इस पावन पर्व पर कहीं गाड़ी की टेंशन नहीं लेनी, बस से ही मज़े-मज़े में सफ़र करेंगे। और सच कहूँ, बस का सफ़र ही पूरे दिन की ऊर्जा लेकर आया।
बस यात्रा की रौनक
सुबह की ठंडी हवा, रास्ते में चलती बस, लोगों की बातचीत, कहीं कंडक्टर की सीटों के नाम पुकारने की आवाज़… सब मिलकर एक अलग ही माहौल बना रहे थे। हम तीनों अपने-अपने अंदाज़ में हँसते-मज़ाक करते हुए कुरुक्षेत्र की ओर बढ़ रहे थे। मन में उत्सुकता भी थी और श्रद्धा भी — आखिर उस पवित्र भूमि पर जा रहे थे जहाँ श्रीकृष्ण ने अर्जुन को श्रीमद भगवद् गीता का उपदेश दिया था।
कुरुक्षेत्र पहुँचते ही रंगों का मेला
जैसे ही हम कुरुक्षेत्र पहुँचे, लगा जैसे पूरा शहर रोशनी से जगमगा रहा हो। गीता जयंती के कारण हर तरफ़ एक अलग ही उत्सव का माहौल था।
सबसे पहले हमारी नज़र पड़ी — सामान की सजी हुई अनगिनत स्टॉलों पर।
कहीं लकड़ी की कलाकृतियाँ, कहीं धार्मिक पुस्तकें, कहीं छोटे-छोटे शो-पीस, कहीं हस्तशिल्प… ऐसा लगता था जैसे पूरा हरियाणा और आसपास के राज्य अपनी कला लेकर यहीं इकट्ठा हो गए हों।
नाच-गाने के मंच – संस्कृति का उत्सव
आगे बढ़े तो कई जगह बड़े-बड़े मंच सजे मिले।
कहीं बच्चों का सांस्कृतिक कार्यक्रम चल रहा था,
कहीं लोक-नृत्य,
कहीं भजन संध्या,
तो कहीं कलाकार अपनी गायकी से भीड़ को मंत्रमुग्ध कर रहे थे।
हवा में हल्की ठंडक थी, पर लोगों की ऊर्जा इतनी गर्म थी कि मौसम का अहसास ही नहीं होता था। सुरेन्दर बीच-बीच में फोटो खींचता रहा, और सुचा हर मंच पर जाकर कहता — “चल, इसे भी दो मिनट देख लेते हैं।”
ब्रह्मसरोवर – दिव्यता का अनुभव
और फिर हम पहुँचे उस जगह, जहाँ जाने की सबसे ज़्यादा इच्छा थी — ब्रह्मसरोवर।
सच कहूँ तो, वहाँ पहुँचते ही ऐसा लगा मानो समय थम गया हो।
सरोवर के चारों ओर दीपों की लड़ी झिलमिला रही थी।
उसकी पानी में पड़ती परछाइयाँ एक अद्भुत दृश्य बना रही थीं।
मन में अपने आप शांति उतर आई।
सरोवर के आसपास भी ऊँचे-ऊँचे पंडालों में दुकाने सजाई गई थीं।
कहीं गर्मागर्म कचौरी, कहीं रेवड़ी-गज्जक, कहीं पूड़ी-सब्ज़ी की महक…
सुरेन्दर तो हर दुकान पर रुक जाता, “ये भी चख लेते हैं!”
श्रद्धा और उत्सव का संगम
गीता जयंती वास्तव में ऐसा आयोजन है जहाँ आस्था और संस्कृति दोनों एक साथ जीवंत हो उठते हैं।
लोग दूर-दूर से आते हैं, परिवारों के साथ, बच्चों के साथ, बुज़ुर्गों के साथ…
हर किसी के चेहरे पर एक सुकून और एक उत्साह दिखता है।
मंचों पर श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद की झाँकियाँ थीं,
यज्ञ हो रहे थे,
कलाकार गीता के श्लोकों का वाचन कर रहे थे।
इस तरह की सकारात्मक ऊर्जा बहुत कम जगह महसूस होती है।
हम तीनों की हँसी-मज़ाक और यादें
यात्राएँ तभी खूबसूरत बनती हैं जब साथ अच्छा हो।
सुरेन्दर के मज़ाक,
सुचा की खाने की लालसा,
और मेरा कैमरे से हर पल कैद करते रहना…
सबने इस दिन को और भी यादगार बना दिया।
थकान थी, पर दिल खुश था।
भीड़ थी, पर मन शांत था।
रात हुई, रोशनियाँ और बढ़ीं, और पूरा कुरुक्षेत्र एक त्योहार की तरह चमक उठा।
वापसी में बस का सफ़र – मन में भरी संतुष्टि
जब हम रात को बस में लौट रहे थे, तीनों चुप थे — शायद दिन के अनुभवों को मन ही मन जी रहे थे।
हम सबके चेहरे पर हल्की-सी थकान और बड़ी-सी मुस्कान थी।
कभी-कभी मन कहता है…
“ऐसी यात्राएँ प्लान नहीं होतीं, अपने आप हो जाती हैं — और दिल में हमेशा के लिए बस जाती हैं।”
गीता जयंती की यह यात्रा मेरे जीवन की ऐसी ही एक स्मृति बन गई है —
आस्था, संस्कृति, दोस्ती और खुशियों का सुंदर संगम।

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