ज़िंदगी में कुछ लम्हे ऐसे होते हैं जो वक़्त बीत जाने के बाद भी स्मृतियों में उसी ताजगी के साथ बने रहते हैं। यह भी एक ऐसा ही दिन था, जब मैं कक्षा 11वीं में पढ़ता था।
हमारे गाँव में स्कूल केवल 10वीं तक ही था। 10वीं के बाद पढ़ाई जारी रखने के लिए हमें पास के गाँव थोल जाना पड़ता था, जो हमारे गाँव से लगभग 4–5 किलोमीटर दूर था। रोज़ की तरह हम वहाँ साइकिल से जाते थे। आमतौर पर मैं अपनी चाचा की बेटी, परमजीत (बेबी) के साथ जाता था। मगर उस दिन बेबी ने छुट्टी कर ली थी और मैं अकेला ही साइकिल पर स्कूल गया।
तूफ़ानी दिन की शुरुआत
दोपहर को स्कूल से छुट्टी हुई। मौसम का मिज़ाज बदल चुका था। आसमान में काले बादल उमड़-घुमड़ कर आ रहे थे। ऐसा लग रहा था जैसे कभी भी आंधी-तूफ़ान आ सकता है। मेरे मन में डर था कि आज बिना भीगे घर पहुँचना मुश्किल होगा।
साइकिल भी उस दिन कुछ ठीक-ठाक हालत में नहीं थी। जैसे-तैसे मैं गाँव की सड़क तक पहुँचा ही था कि सामने से तेज़ आंधी ने घेर लिया। हवा के झोंके इतने तेज़ थे कि लग रहा था जैसे यह मुझे घर की बजाय उल्टी दिशा में खींच ले जाएगी।
तूफ़ान और बारिश की मार
सड़क के किनारे खड़े कीकर के पेड़ से सूखी टहनियाँ टूट-टूटकर गिर रही थीं। एक-दो टहनियाँ इतनी भारी थीं कि उन्हें ज़ोर लगाकर ही रास्ते से हटाना पड़ा। तभी तेज़ बारिश ने भी आंधी का साथ देते हुए मुझे पूरी तरह भिगोना शुरू कर दिया।
https://a.co/d/7iO0U7Kमैंने अपने स्कूल बैग में रखी 4–5 किताबों को (जो उस समय लिफ़ाफ़े में ही रहती थीं) अच्छी तरह लपेटकर साइकिल के पीछे वाले कैरियर पर रख दिया। मगर मैं खुद पूरा भीग चुका था।
अब साइकिल चलाना मुश्किल हो गया था। आंधी और बारिश ने मिलकर मुझे पैदल चलने पर मजबूर कर दिया। मैंने साइकिल के पीछे एक टूटी हुई टहनी भी बांध ली और धीरे-धीरे पैदल ही आगे बढ़ने लगा।
गाँव तक का सफर और सुकून का पल
करीब आधे घंटे बाद मैं गाँव पहुँचा। अब आंधी कम हो चुकी थी लेकिन बारिश लगातार जारी थी। घर पहुँचते ही मैंने भीगे कपड़े बदले, वह टहनी एक किनारे रख दी और ठंड से कांपता हुआ खाने की टेबल पर बैठ गया।
खाना खाने और गरम चाय पीने के बाद ही कुछ राहत महसूस हुई। उस दिन का संघर्ष आज भी याद है।
https://www.amazon.com/dp/B0FLWFVMLP?ref_=pe_93986420_774957520संघर्ष की सीख
उस समय का संघर्ष आज के संघर्षों के सामने छोटा लग सकता है, लेकिन उस उम्र में वह हमारे लिए बड़ा था।
यह घटना सिर्फ़ एक तूफ़ान में घर लौटने की कहानी नहीं थी; यह उस समय की हमारी मासूमियत, हिम्मत और संघर्ष की भी याद है।
ब्लॉग का अंत और सीख
जीवन की हर कठिनाई हमें मजबूत बनाती है। बचपन में झेले गए छोटे-छोटे संघर्ष हमें बड़े संघर्षों के लिए तैयार करते हैं।
आज जब हम पीछे मुड़कर देखते हैं, तो यह एहसास होता है कि जो पल हमें उस समय मुश्किल लगते थे, वही हमें आगे बढ़ने की प्रेरणा भी देते हैं।
आपके लिए संदेश
दोस्तों, अपने बचपन की यादों को सहेजकर रखें। उन संघर्षों को याद करें, जिनसे आपने सबक सीखे हैं। यह यादें ही हमें सिखाती हैं कि ज़िंदगी में हर चुनौती पार की जा सकती है।
आपके बचपन की भी ऐसी कोई याद है? हमें कमेंट में ज़रूर बताएँ!


No comments:
Post a Comment