मेले का उत्साह
सुबह से ही गाँव में दशहरे की चहल-पहल थी। बच्चे नए कपड़े पहनकर झूलों, खिलौनों और मिठाइयों की दुकानों की ओर भाग रहे थे। महिलाएँ सजधजकर मेला घूमने आई थीं और बुजुर्ग रामलीला की अंतिम रात्रि का बेसब्री से इंतजार कर रहे थे। पूरा गाँव जैसे एक परिवार की तरह इस आयोजन में शामिल था।
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रामलीला का मंचन
रात को जब रामलीला शुरू हुई तो पूरा पंडाल खचाखच भरा हुआ था। यह आखिरी रात थी, इसलिए दर्शकों का उत्साह देखने लायक था। पहला दृश्य था – मेघनाद द्वारा लक्ष्मण को मूर्छित करने का। मंच पर ऐसा वातावरण बना मानो सचमुच कोई संकट आ गया हो। पूरे पंडाल में एक क्षण को शोक-सा माहौल छा गया।
सुषेन वैद्य का दृश्य
इसके बाद हनुमान जी वैद्य सुषेन को लाए। यहाँ एक दिलचस्प मोड़ आया – सुषेन वैद्य का किरदार मुझे निभाना था। मुझे कहा गया कि “आज आप वैद्य जी बन जाइए।” मैंने एक थैला और नाटकीय रूप धारण किया और चारपाई पर लेट गया। चार लोग मुझे उठाकर मंच तक लाए। दर्शक इस दृश्य को देखकर हँसी और ताली बजाकर खूब आनंद ले रहे थे।
वैद्य ने हनुमान जी को आदेश दिया कि सूर्योदय से पहले संजीवनी बूटी लानी होगी, तभी लक्ष्मण की जान बच सकती है। पर्दा गिरा और मंच सजाने की तैयारी हुई। एक बेंच पर रंग-बिरंगी झालरों और फूल-पत्तियों से सजी संजीवनी बूटी रखी गई। जब हनुमान जी बूटी लेकर आए और लक्ष्मण को सुंघाई, तो लक्ष्मण जीवित हो उठे। पूरा मैदान “जय श्रीराम” और “जय बजरंगबली” के नारों से गूंज उठा।
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रावण का भव्य प्रवेश
इसके बाद युद्ध का दृश्य आया। पहले लक्ष्मण ने मेघनाद का वध किया और फिर रावण की एंट्री हुई। रावण रथ पर सवार होकर मंच पर आया। जैसे ही उसने कदम रखा, पूरा पंडाल “जय लंकेश” के नारों से गूंज उठा। दर्शक मोबाइल से फोटो और वीडियो बनाने लगे। मंच के सामने इतनी भीड़ थी कि लोगों को संभालना मुश्किल हो गया।
रावण के संवाद शुरू होते ही पूरा पंडाल शांत हो गया। एक-एक शब्द पर दर्शक ध्यान लगाए बैठे थे। राम और रावण के बीच का युद्ध देखकर लोगों की सांसें थम-सी गईं। अंत में भगवान राम ने अग्निबाण चलाकर रावण का वध किया।
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जैसे ही रावण गिरा, दर्शकों ने “जय श्रीराम” का जयघोष किया और कुछ लोग घर लौटने लगे। हालांकि आयोजक लगातार अपील कर रहे थे कि लोग रावण की अंतिम सीख सुनकर ही जाएँ, लेकिन कुछ दर्शक बीच में ही उठकर चले गए। अंत में आरती हुई और इस तरह रामलीला का समापन हुआ।
गाँव का दशहरे का मेला और रामलीला सिर्फ़ धार्मिक मंचन नहीं बल्कि हमारी संस्कृति, आस्था और एकता का प्रतीक है। हर किरदार, हर दृश्य और हर संवाद में हमारी परंपरा की झलक दिखाई देती है। यह अनुभव न केवल भक्ति से जोड़ता है, बल्कि हमें अच्छाई की विजय और बुराई के पतन का संदेश भी देता है।
अगर आपने कभी गाँव की रामलीला और दशहरे का मेला नहीं देखा, तो जीवन में एक बार ज़रूर देखिए। यह अनुभव आपको भारतीय संस्कृति की जड़ों से जोड़ देगा और जीवनभर याद रहेगा। Continue..............




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