आज सुबह जब मेरी आँख खुली तो घड़ी में 10 बज रहे थे। खिड़की के बाहर देखा तो काले बादलों ने आसमान को जैसे अपने आगोश में ले लिया था। ठंडी हवा चल रही थी और मौसम बहुत ही सुहावना लग रहा था। भीतर से एक अजीब-सी खुशी महसूस हुई – जैसे प्रकृति खुद बुला रही हो, “चलो, आज मेरे साथ एक कप चाय पी लो।”
जैसे ही कमरे का ताला लगाया, आसमान से मोटी-मोटी बूंदें गिरने लगीं। मन में थोड़ी घबराहट हुई, पर मैंने भी ठान लिया था — “चाय तो पीनी ही है!” सीढ़ियाँ उतरते ही बाइक निकाली और तेजी से चल पड़ा। लेकिन वही हुआ जिसका डर था — बारिश ने भी अपनी रफ्तार बढ़ा दी। अब बूंदें बारीक हो चुकी थीं, पर इतनी कि हर चीज़ को भिगो दें।
रास्ते में ट्रैफिक सिग्नल पर पहुँचा तो किस्मत से हरी बत्ती जल उठी, मैं निकल गया। अगले सिग्नल पर कुछ गाड़ियाँ रुकी थीं क्योंकि सामने वाली लाइट शायद खराब थी। मैंने इशारा किया कि साइड की लाइट हरी है, चलो आगे बढ़ो — पता नहीं उन्होंने मेरी बात समझी या नहीं, पर मैं तो निकल गया।
आखिरकार मैं अपने पसंदीदा चायवाले के ठेले पर पहुँच गया। बारिश अब तेज़ हो चुकी थी। बाइक साइड में लगाई और उसके बरामदे में जाकर खड़ा हो गया। वहाँ कई लोग बारिश से बचने के लिए पहले से मौजूद थे। मैंने चायवाले से कहा, “भाई, एक चाय और मठी दे देना।”
थोड़ी देर में गर्मागरम चाय और करारी मठी आ गई। पहली ही चुस्की में जो सुकून मिला, वह शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता। बारिश की रिमझिम, मिट्टी की खुशबू, और चाय की भाप – बस, ज़िंदगी का यही असली मज़ा है।
बरसात के उस नज़ारे को मैंने अपने मोबाइल में कैद भी किया। बाहर एक आदमी पेड़ के नीचे बड़े से छाते के नीचे बैठा अपने काम में मग्न था। उसके चारों ओर पानी जमा था, लेकिन वो पूरी तल्लीनता से अपने काम में लगा था — जैसे बारिश भी उसकी दिनचर्या का हिस्सा हो।
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जब लगा कि बारिश कम हो रही है, मैं निकलने को हुआ — लेकिन तभी वो फिर तेज़ हो गई, जैसे कह रही हो, “एक चाय और पी लो।” मैंने मुस्कराते हुए उसकी बात मान ली और एक और चाय मंगा ली। चाय पीकर ऑनलाइन पेमेंट किया और बारिश को निहारने लगा।
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थोड़ी देर बाद बारिश कुछ थमी तो मैंने बाइक स्टार्ट की और कमरे की ओर चल पड़ा। जैसे ही कमरे में पहुँचा, फिर से बारिश शुरू हो गई — और इस बार तो और भी तेज़। मैंने कंप्यूटर ऑन किया और यही ब्लॉग लिखने बैठ गया, जिसे आप अभी पढ़ रहे हैं।
इस वक्त भी बाहर बारिश हो रही है, खिड़की के शीशों पर बूंदों की टपकन एक लय में बज रही है। कभी मैं बारिश को देखता हूँ, कभी इस ब्लॉग की पंक्तियाँ टाइप करता हूँ।
दोपहर के तीन बजे दफ्तर भी जाना है, लेकिन उस वक्त का मौसम कैसा होगा — ये तो वक्त ही बताएगा।
फिलहाल तो मैं भी इस बारिश का आनंद ले रहा हूँ, और आपसे भी यही कहूँगा —
“बारिश में भीगना नहीं, महसूस करना सीखो —
ज़िंदगी का स्वाद चाय की तरह गर्म और ताज़ा लगने लगेगा।” ☕🌧️
– आपका अपना,
सुरेश कुमार

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