Tuesday, October 14, 2025

वो झटका जो आज भी हंसा देता है – बचपन की एक शरारती याद

बात उन दिनों की है जब मैं आठवीं कक्षा में पढ़ता था। हमारे घर की बनावट उस दौर के गाँवों जैसे ही थी — पीछे दो कमरे, एक बरामदा, एक रसोई और आगे खुला आंगन। घर बड़ा न था, पर उसमें अपनापन भरा था। बरामदे में हमारी भैंस बंधी रहती थी, क्योंकि बाहर भैंस बांधने की जगह नहीं थी। आंगन के एक कोने में गोबर के उपलों से बना घूरा था, जहाँ माँ रोज उपले सुखाती थी। 


गर्मियों के दिन थे। पिता जी खेत में काम पर गए हुए थे और माँ शायद पड़ोस के घर में किसी काम से गई हुई थीं। मैं उस दिन स्कूल से लौटा ही था। घर में सन्नाटा था, बस बरामदे में पड़ी ठंडी हवा और भैंस की घुरघुराहट सुनाई दे रही थी।

हमारे पास उस समय एक टेप रिकॉर्डर हुआ करता था — वही पुराना, जिसमें ऑडियो कैसेट डालकर गाने सुना करते थे। वो टेप रिकॉर्डर हमारे घर की शान था। बरामदे में दीवार पर बने लकड़ी के शेल्फ पर रखा रहता था और नीचे से बिजली के तार के ज़रिए प्लग में जुड़ा होता था।

मैंने सोचा, थोड़ा आराम करता हूँ और गाने सुनता हूँ। पर जैसे ही मैंने टेप चलाने की कोशिश की, देखा कि बिजली का तार टेप रिकॉर्डर से थोड़ा खिंचकर निकल गया है। बस, फिर क्या था! बिना ज़्यादा सोचे-समझे मैंने वो तार हाथ में उठाया और सीधे टेप रिकॉर्डर में लगाने की कोशिश की।

और तभी — धड़ाम!

तार का नंगा हिस्सा मेरे हाथ से छू गया, और एक ज़ोर का झटका लगा। मैं जैसे हिल ही गया। एक सेकंड को समझ नहीं आया कि क्या हुआ। अगले ही पल मैं बरामदे के फर्श पर जा गिरा।

फर्श ईंटों का बना था और उस पर गीला गोबर फैला हुआ था, क्योंकि सुबह ही माँ ने गोबर से फर्श लीपा था। मैं सीधे उसी में जा धँसा — पूरे कपड़ों समेत! झटके से मेरा सिर घूम गया और शरीर कुछ पल के लिए सुन्न पड़ गया।

कुछ मिनट बाद जब होश आया, तो खुद पर हँसी भी आई और गुस्सा भी। पूरा शरीर दर्द से टूट रहा था, पीठ में जलन सी महसूस हो रही थी, और कपड़े गोबर से सने हुए थे। मैंने जल्दी से उठकर खुद को देखा तो हालत देखकर खुद ही मुस्कुरा पड़ा।

बाद में जब माँ घर लौटीं और मैंने सारी बात बताई, तो पहले तो उन्होंने घबराकर मेरा हाल देखा, फिर कहा —
"तू तो भगवान का लाडला है रे! ज़िंदा बच गया वरना पता नहीं क्या हो जाता!"
फिर डाँट भी पड़ी —
"बिजली की तार से कोई ऐसे खेलता है क्या!"

पर उस दिन का वो झटका मुझे एक ज़िंदगी का सबक दे गया — कभी बिना सोचे समझे कुछ नहीं करना चाहिए।

आज जब उस दिन को याद करता हूँ, तो हँसी रुकती नहीं। वो दर्द तो कब का चला गया, पर उस घटना की याद अब एक प्यारी मुस्कान छोड़ जाती है। बचपन ही तो था — जब डर से ज़्यादा जिज्ञासा थी, और सोचने से ज़्यादा करने की आदत।

कभी-कभी लगता है कि अगर वो छोटे-छोटे हादसे न होते, तो शायद बचपन की यादें इतनी मीठी भी न होतीं। अब जब भी टेप रिकॉर्डर या बिजली के पुराने तार देखता हूँ, तो मन कह उठता है —
"वो झटका नहीं था, वो बचपन का सबक था!

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