Sunday, October 12, 2025

एक रात की लंबी यात्रा – जब बाइक, बारिश और किस्मत सब साथ आए

लेखक – सुरेश कुमार
(Meri Zindagi ब्लॉग श्रृंखला से)

अक्सर ज़िंदगी के छोटे-छोटे पल ही सबसे बड़े सबक दे जाते हैं। 


अभी कुछ दिन पहले ही दशहरे की छुट्टी पर घर गया था। मुश्किल से तीन-चार दिन हुए थे वापस आए हुए। अब फिर करवा चौथ आने वाला था। घर से फ़ोन आया कि “करवा चौथ की छुट्टी ले लेना, वीरवार की शाम को निकल आना, शुक्रवार की छुट्टी हो जाएगी और शनिवार को वापस ऑफिस चले जाना।”

मैंने अपने एक दोस्त से बात की — उसकी छुट्टी शुक्रवार को होती थी, तो कहा कि “तू बुधवार की छुट्टी कर ले, मैं शुक्रवार को तेरे साथ बदल लूंगा।” लेकिन उसने मना कर दिया।
अब मेरे पास कोई विकल्प नहीं था — आज मंगलवार को ही निकलना था।


शुरुआत ही मुश्किलों से

ऑफिस में काम के बीच घर से एक कॉल आया। फ़ोन हाथ से छूटा और ज़मीन पर गिरकर स्क्रीन टूट गई।
कैश भी नहीं था। सोचा, पेट्रोल पंप पर तो ऑनलाइन पेमेंट कर दूंगा — लेकिन अब फ़ोन की स्क्रीन टूटी थी।
समझ नहीं आया क्या करूं। फिर एक साथी से अपनी परेशानी बताई। उसने ₹500 दिए — और कहा, “बस सुरक्षित पहुंच जाना।”

रात के 10 बजे थे, जब ऑफिस से निकल कर मैं बाइक स्टार्ट करने लगा।
लेकिन दिनभर की बारिश ने जैसे बाइक की जान ही निकाल दी थी।
प्लग में पानी चला गया था, बाइक बार-बार बंद हो रही थी।
20 मिनट कोशिश करने के बाद भी स्टार्ट नहीं हुई।
थक हारकर मैंने उसे धकेलते हुए चलना शुरू किया।


रास्ते की मुलाकात

करीब एक किलोमीटर चलने के बाद मैं मेन रोड पर पहुंचा।
थकान से पसीने में भीग गया था। तभी देखा — बस स्टॉप के पास एक लड़का खड़ा था, जिसकी बाइक जम्मू-कश्मीर नंबर की थी।
उसने पूछा,
“भाई क्या हुआ?”

मैंने कहा, “पेट्रोल खत्म हो गया है, पेट्रोल पंप तक ले जाना है।”

वो मुस्कराया और बोला, “कोई बात नहीं, मैं देता हूं।”
मैंने मना किया, पर उसने ज़िद करके एक छोटी शीशी में अपनी बाइक से पेट्रोल निकाला और मेरी बाइक में डाल दिया।

फिर दोनों ने मिलकर बाइक स्टार्ट करने की कोशिश की — लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ।
फिर कुछ और कोशिशों के बाद, जैसे किस्मत पिघल गई — बाइक “ठक-ठक” की आवाज़ के साथ चालू हो गई।
मैंने उसे धन्यवाद कहा, और वो अपने रास्ते चला गया।

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कहानी यहीं खत्म नहीं हुई थी

थोड़ी ही दूर चला था कि बाइक फिर बंद हो गई।
इस बार आसमान में बादल और गहरे हो चुके थे।
फिर वही धक्का, वही कोशिशें — 15 मिनट की मशक्कत के बाद भी कुछ नहीं हुआ।
थककर फिर से बाइक को घसीटते हुए चल पड़ा।
ब्लॉंगी गांव के पास पहुंचा तो एक बार फिर कोशिश की — और इस बार बाइक ने साथ दे दिया।

साँस में साँस आई।
जल्दी से पेट्रोल पंप पहुंचा, टंकी फुल करवाई, और राहत की सांस ली।


रात की ठंड और एक सुकून

रात के 12:15 बजे मैं घर पहुंचा।
थंड इतनी बढ़ चुकी थी कि बाइक से उतरते ही शरीर कांप उठा।
घर आकर जल्दी से कपड़े बदले, खाना खाया, गरम चाय पी और रजाई में घुस गया।
थकान इतनी थी कि कब नींद आ गई, पता ही नहीं चला।

अगली सुबह इस्माईलाबाद जाना था — टूटी स्क्रीन बदलवाने।
पर उस रात की याद आज भी ज़ेहन में ताज़ा है।


जीवन का सबक

उस दिन समझ आया कि ज़िंदगी हमेशा सीधी राह नहीं देती।
कभी बाइक नहीं चलती, कभी बारिश रुकती नहीं, कभी फ़ोन टूट जाता है —
पर रास्ता हमेशा मिलता है, और मददगार भी।

कभी किसी अजनबी के रूप में,
कभी अपने साहस के रूप में।

ज़िंदगी भी कुछ वैसी ही है —
कभी धकेलनी पड़ती है,
कभी खुद चल पड़ती है।



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