Tuesday, October 7, 2025

कब्रिस्तान से खेल का मैदान — बचपन की अनमोल यादें

हर गाँव, हर छत के नीचे कुछ ऐसी जगहें होती हैं जो बचपन की खुशबू संजोकर रखती हैं — हमारे लिए वह जगह हमारे घर के बिल्कुल सामने वाला मैदान था। बाहर सड़क, उसके सामने ताया-चाचा के चार-पाँच घर एक ही लाइन में, और उनके ठीक सामने फैला वह खुला मैदान — जिस पर कभी कब्रें बनी थीं और मुसलिम समुदाय अपने अतीत को विदा देता था। आज वही जगह मस्जिद में बदल चुकी है, पर जो यादें उस खुली ज़मीन से जुड़ी हैं, वे अब भी हमारे साथ हैं। 


हमें बचपन से ही किसी चीज़ से खास डर नहीं लगा करता था — पर घर वाले हमेशा कहते थे, “रात को उस मैदान में मत जाओ।” पर वह मैदान इतना खुला और आम था कि दिन हो या रात, हम आसानी से उसमें घुस जाया करते थे। बीच में सिर्फ आठ-फुट की एक तंग गली थी; उस गली के पार कुछ कच्ची कब्रें दिखाई दे जातीं — पर हमने कभी उन्हें भयानक नहीं माना। ग्रीष्म की शामों में हम वहीं खेलते, हँसते और झूले से स्कूल का होमवर्क करते थे।

मौसम के हिसाब से मैदान अपनी सूरत बदलता रहता था — घास, मदार के पौधे और जंगली फूल हर तरफ़ खिल जाते थे। उन रंग-बिरंगे फूलों के बीच बचपन की सैर कुछ और ही आनंद देती थी। गर्मियों में मैं स्कूल से लौटते ही किक्कर के पेड़ पर रस्सी बाँधकर झूला डाल देता, उस झूले पर चौपाई रखकर बैठकर पढ़ाई करता। सावन के महीने में, तेज़ी के त्योहरों पर वही झूला पूरे मोहल्ले का केंद्र बन जाता — सभी मिलकर झूलते, गाते और खुशियाँ बाँटते। दिन में किसान जैसे गेहूँ और जीरे को धूप में सुखाने के लिए वहीं फैला देते; शाम को थैलों में भरकर अगली सुबह फिर बिछा देते — जीवन का साधारण सा चक्र वहीं चलता था।

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वहाँ भैंसे चरती रहती थीं, उनका बड़बड़ाता स्वर भी उस मैदान की धड़कन बन गया था। पर एक रात की बात आज भी हमें हँसा-हँसा कर लोटपोट कर देती है — चाँदनी बहुत तेज़ थी और आक के पौधे की पत्तियाँ सफेद सी चमक रही थीं। पास की चाची ने चिल्लाकर बताया कि कब्रिस्तान में कोई सफेद कपड़े पहने बैठा है — और यह सुनते ही मोहल्ले में खलबली मच गई। पिता जी दौड़े हुए बाहर आए — किसी की गर्दन पकड़ने जैसा तेवर अपनाया। पर जब उन्होंने पास जाकर देखा तो वह कोई भूत नहीं, बल्कि वही आक का पौधा था, जिसकी पत्तियाँ चाँदनी में इतनी सफेद लग रही थीं कि डर पैदा हो गया था। सब हँस पड़े — चाची ने पौधे को भूत बना दिया था और पिता जी की बहादुरी ने बचपन की वह डरभरी घटना हँसी में बदल दी। 

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आज वही खुला मैदान नहीं रहा। वही जगह अब मस्जिद बन चुकी है; वह खुलापन, वह निर्भीकता और वह बिना किसी सीमा के खेलना — सब बदल गया। मोहल्ला अब थोड़ा बंद-सा, अनुशासित-सा लगने लगा है। पर जब हम साथ बैठकर उन दिनों को याद करते हैं, तो वही मासूमियत और निर्भीकता की गर्माहट फिर से जी उठती है। वह कहानीें, वह झूला, पके हुए जीरे की खुशबू — सब दिल के किसी कोने में संजोई हुई हैं। 

जिंदगी आगे बढ़ती है, शहर बनते हैं, जगहें बदलती हैं, पर बचपन की वो खुली ज़मीन और उसकी छोटी-छोटी घटनाएँ हमें हमेशा वापस खींच लाती हैं। उन यादों में एक सादगी और बिना डर के जीना मिलता है — जो अब विरल हो चला है। कभी-कभी मैं सोचता हूँ कि वही माहौल, वही खुलापन अगर लौट आएं तो जीवन कितना आसान और खुशहाल दिखेगा।

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