गाँव में होने वाला दशहरे का मेला तो मानो पूरे गाँव को एक सूत्र में बाँध देता है। पहले दिन रामलीला के मंचन और रावण वध के बाद अब बारी थी दूसरे दिन के असली आकर्षण – रावण दहन और झांकी यात्रा की। इस दिन का उत्साह और मेहनत हर किसी के चेहरे पर साफ झलक रहा था।
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रावण के पुतले को खड़ा करने की मशक्कत
रातभर की थकान के बावजूद कुछ कलाकार वहीं रुक गए थे, ताकि सुबह होते ही रावण के पुतले को मैदान में खड़ा किया जा सके। सुबह के लगभग पाँच बज चुके थे जब पुतले को उठाकर मैदान में लाया गया। यह इतना भारी था कि आठ-दस लोग मिलकर भी बड़ी मुश्किल से उठा पा रहे थे।
बांस की लंबी डंडियों पर रस्सियां बाँधकर पुतले को गाड़ने की कोशिश हुई, लेकिन जैसे ही जोर लगाया गया, एक बांस का डंडा टूट गया और पुतला गिरते-गिरते बचा। माहौल एकदम तनावपूर्ण हो गया। तभी ट्रैक्टर-ट्रॉली मंगवाई गई और रस्सियों की मदद से आखिरकार सुबह छह बजे तक पुतला खड़ा हो सका। इस मेहनत के बाद सब थककर घर चले गए और थोड़ी देर आराम किया।
झांकी की तैयारी और DJ का झंझट
अब बारी थी झांकी सजाने की। दोपहर दो बजे सब मैदान में इकट्ठा हुए। ट्रॉली सजाई गई और उसमें छोटे बच्चों को भगवान राम, लक्ष्मण, सीता, हनुमान और सुग्रीव का रूप दिया गया। पूरी ट्रॉली को फूलों और झालरों से सजाया गया।
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लेकिन जैसे ही निकलने की तैयारी हुई, एक नई मुश्किल सामने आ गई। DJ जो बुक किया गया था, वह अब तक नहीं आया था। कई बार फोन करने के बाद वह पहुँचा, लेकिन DJ मशीन ही चालू नहीं हो रही थी। आधा घंटा लगने के बाद उन्होंने दूसरा ऑपरेटर बुलाया और तब जाकर DJ की गूंज ने पूरे माहौल को उत्साह से भर दिया।
झांकी यात्रा का शुभारंभ
आखिरकार झांकी रवाना हुई। सबसे आगे पटाखे फोड़ने वाले, उसके बाद DJ की गाड़ी, फिर झांकी वाली ट्रॉली जिसमें कलाकार बैठे थे, और पीछे-पीछे एक और ट्रॉली जिसमें छोटे-छोटे बच्चे उत्साह से शोर मचा रहे थे।
मुझे भी एक जिम्मेदारी दी गई थी—गली-गली में लोगों को प्रसाद बाँटना। हम दोनों ने गले में चुनरी डालकर उस पर प्रसाद रखने की थैलियाँ टाँग लीं और लोगों को रास्ते में प्रसाद बाँटते गए। जगह-जगह लोग भगवान राम और लक्ष्मण की आरती उतारते, माथा टेकते और श्रद्धा से प्रसाद ग्रहण करते।
करीब दो घंटे तक यह झांकी गाँव की गलियों से घूमते हुए फिर मैदान में पहुँची।
रावण दहन का दृश्य
शाम होते-होते मैदान लोगों से खचाखच भर गया। चारों ओर खाने-पीने और खिलौनों की दुकानें सजी हुई थीं। आस-पास के घरों की छतों पर भी लोग इस दृश्य को देखने के लिए चढ़े हुए थे।
मंच पर राम और लक्ष्मण ने अपने धनुष उठाए और जैसे ही रावण के पुतले पर तीर चलाए, पूरा मैदान “जय श्रीराम” के नारों से गूंज उठा। पुतले में लगे पटाखे धड़ाधड़ फूटने लगे और लोग सुरक्षित दूरी बनाने के लिए भागने लगे। धीरे-धीरे रावण का विशालकाय पुतला पूरी तरह जलकर राख हो गया।
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राम का राज्याभिषेक और समापन
रावण दहन के बाद मंच पर भगवान राम, लक्ष्मण और विभीषण का राज्याभिषेक का दृश्य दिखाया गया। माता सीता के साथ सबके अयोध्या लौटने का प्रसंग दर्शाया गया। इस दृश्य ने पूरे आयोजन को भव्य और पवित्र बना दिया।
रात आठ बजे तक पूरा आयोजन संपन्न हुआ। हम सब थकान से चूर होकर घर लौटे। शरीर में दर्द था लेकिन मन में एक अद्भुत संतोष और खुशी थी। रात नौ बजे तक खाना खाकर हम गहरी नींद में सो गए।
गाँव का दशहरे का मेला सिर्फ एक उत्सव नहीं बल्कि हमारी संस्कृति और परंपरा की जीवंत झांकी है। यह आयोजन हमें सिखाता है कि चाहे कितनी भी कठिनाइयाँ क्यों न आएं, सामूहिक प्रयास और सहयोग से हर काम संभव है। रावण दहन केवल एक नाटक नहीं बल्कि यह अच्छाई की बुराई पर विजय का प्रतीक है।
अगर आपने गाँव का दशहरा और झांकी यात्रा कभी नहीं देखी, तो अगली बार ज़रूर अनुभव करें। यह सिर्फ़ एक त्यौहार नहीं, बल्कि जीवनभर याद रहने वाली सांस्कृतिक धरोहर है।


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