लॉकडाउन का समय… जब सारी दुनिया थम-सी गई थी। काम-धंधे बंद, बाज़ार सुनसान और लोग घरों में कैद। एक महीने तक घर में बैठे-बैठे ऊबना स्वाभाविक था। लेकिन यही ठहराव हमें पुराने दिनों की याद दिला गया। वही गाँव का जीवन, वही खेत-खलिहान और वही सादगी – जैसे समय ने करवट ली और हमें फिर से बचपन में पहुँचा दिया हो।
लॉकडाउन में बैठे-बैठे मैंने सोचा, क्यों न खेतों में कुछ काम कर लिया जाए। गेहूँ की कटाई का मौसम भी आ चुका था। बचपन की छुट्टियों में हम सब परिवार के लोग मिलकर खेतों में गेहूँ काटा करते थे। धूप तेज़ होती थी, पर उस मेहनत में एक अलग ही मज़ा था।
आजकल तो मशीनें सब कुछ कर देती हैं। कंबाइन मशीन एक-दो दिन में पूरी फसल काट देती है। लेकिन इस बार हमने ठाना कि कुछ काम अपने हाथों से करेंगे। मैं पिताजी के साथ पास के गाँव “ठोल” चला गया। खेत में खड़ी गेहूँ की बालियाँ काटनी थीं, ताकि मशीन से कटाई के समय फसल बर्बाद न हो।
पहले दिन घर से चाय मँगवाई। मेरी पत्नी और भानजी स्कूटी पर चाय लेकर आईं। हम सब पेड़ की छाँव में बैठकर चाय पी रहे थे। पल भर को ऐसा लगा मानो पुराने दिन फिर से लौट आए हों। वही खेत, वही धूप, वही चाय – फर्क सिर्फ इतना कि अब जेब में मोबाइल था, जिससे मैंने इन पलों को तस्वीरों में कैद कर लिया।
दोपहर को मैं घर आ गया, लेकिन पिताजी ने खेत में ही खाना मंगवा लिया। काम करते-करते उन्होंने मुझे शाम तक घर भेज दिया और खुद डटे रहे। शाम को मैं फिर खेत पहुँचा, इस बार घास लेने। वहाँ बिहारी मजदूर गन्ना छील रहे थे। गन्ने के ऊपरी हिस्से के हरे पत्ते, जिन्हें हम “गोले” कहते हैं, इकट्ठे करके मैंने घास में मिलाया। फिर बर्शीम काटी और वहीं इंजन से टोका करवा लाया।
दो दिन लगातार खेत में काम करने से शरीर दर्द से चूर हो गया। लेकिन उस दर्द में भी एक सुकून था। ऐसा लग रहा था जैसे पुराने दिनों की आत्मा फिर से जीवित हो गई हो। वही मेहनत, वही पसीना, वही संतोष – सब कुछ वैसा ही, जैसा बचपन में था।
लॉकडाउन ने हमें एक अनमोल तोहफ़ा दिया – पुराने दिनों को जीने का मौका।
शहरों की भागदौड़ में जो एहसास खो गए थे, वे खेतों में फिर से मिल गए। शायद यही ज़िंदगी की खूबसूरती है – कभी रुककर, कभी थककर, हमें अपने ही अतीत की ओर लौटा देती है।
दोस्तों,
✨ कभी-कभी ठहरना भी ज़रूरी है।
✨ मशीनें काम जल्दी कर देती हैं, पर दिल का सुख मेहनत और अपनापन ही देता है।
✨ ज़िंदगी का असली स्वाद खेत की मिट्टी, पसीने की बूंदों और सादगी भरे पलों में छिपा होता है।
तो आइए, जब भी मौका मिले, अपने गाँव और खेतों से जुड़ें। क्योंकि यही हमारे अतीत की जड़ें हैं और भविष्य की ताक़त भी।


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