जब कोरोना काल की पहली लहर आई, तो पूरे देश में मानो समय थम गया हो — बाज़ार सूने, सड़कें शांत और लोगों के चेहरों पर अनिश्चितता की परतें छा गयीं। वह वही दौर था जब मेरी नौकरी चली गयी और घर की ज़िम्मेदारियों का बोझ अचानक कंधों पर आ पड़ा। मैंने सोचा — बैठकर क्या करूँगा? उठकर कुछ कर दिखाऊँगा। यही विचार मुझे टी-शर्ट प्रिंटिंग के बिज़नेस की ओर ले गया। यह ब्लॉग उसी संघर्ष, फैसलों और आख़िरकार मिली सीख का सच्चा कहानी है।
यूट्यूब पर मैंने टी-शर्ट प्रिंटिंग के बारे में जानकारी जुटाई। मशीन, स्याही और कच्चा माल — सब कुछ सीखने के बाद मैंने माँ से 75,000 रुपये माँगे और कह दिया कि यह एक छोटा-सा लोन है, जल्दी ही वापस कर दूँगा। माँ ने बिना किसी शिकायत के पैसे दे दिए। उस समय हमारे पास घर में पैसे रखा हुआ बहुत ज़्यादा नहीं था; गाँव के दो छोटे कमरे थे जिनमें अक्सर भूसे और जानवर रखे जाते थे। फिर भी मैंने एक लकड़ी वाले मिस्त्री से दुकान बनवाई और ज़रूरी सामान खरीदकर रखा — बैंक वालों को दिखाने के लिए भी कि व्यापार चल रहा है। (बैंक की शर्तें और PMEGP की असलियत बाद में समझ आई)।
बिज़नेस का आरम्भ और झटके
शुरुआत में दो-तीन महीने ठीक चले। कुछ ऑर्डर आये, कुछ टी-शर्ट बिकीं, उम्मीदें बढ़ीं। पर धीरे-धीरे लॉकडाउन के कारण ग्राहक कम होते गए। पुलिस की सख्ती और बाजार की मंदी ने दुकानों का काम घटा दिया। क़िस्तें आना बंद हुईं और बैंक का दबाव बढ़ने लगा। मैंने सोचा—सामान बेचकर क़िस्त चुकाऊँगा—पर जिनसे समान खरीदा था, वे भी मुश्किल में थे और किसी ने खरीदना बंद कर दिया।
फँसावट और छोटे कामों का सहारा
कर्ज बढ़ता रहा। दुकानों के बंद रहने, आपूर्ति के टूटने और मांग के घटने से मैं धीरे-धीरे दालदल में धँसता गया। छोटे-छोटे ठेके, अस्थायी काम, हाथ-मुँह चलाने के उपाय — सब करने पड़े। एक साल के लिए मुझे अंबाला में नौकरी करनी पड़ी — ताकि रोज़ी रोटी चल सके। फिर भी मन बेचैन था; अपने व्यापार और माँ के दिए पैसों का हिसाब चढ़ा रहता था।
पलटी: वापसी और आत्मनिरीक्षण
कई उतार-चढ़ाव के बाद मैंने निर्णय लिया कि अपने पुराने मोहाली वाले काम पर वापस जाऊँ। नौकरी मिली, और जैसे-जैसे काम में लगने लगा, जिंदगी में फिर से सवेरा हुआ। यह अनुभव दर्द भरा था पर बेहद महत्वपूर्ण भी — इसने सिखाया कि मुश्किलों में बचपन की हिम्मत और माँ की दी हुई सहानुभूति कितनी मायने रखती है।
कोरोना काल ने कई लोगों की ज़िंदगी पलट दी — मेरी भी। पर इसी कठिनाई ने मुझे सिखाया कि जीवन में ठोकरें लगना सामान्य है; और उनसे उठकर आगे बढ़ना असली हिम्मत है। आज जब मैं पीछे मुड़कर देखता हूँ, तो सिर्फ दर्द नहीं, बल्कि अनुभव और नई दिशा भी दिखती है।
घर-बार बिक जाते हैं उधारी चुकाते-चुकाते,
ये ज़िंदगी क्या है बस एक बोझ, उठाए-उठाते।
ख्वाबों की बस्ती में अब कुछ नहीं बाकी,
बस रह गई राख उम्मीदों की, जलाते-जलाते।
अगर आपकी भी ऐसी कोई संघर्ष-कहानी है — चाहे छोटा-सा नुकसान हो या बड़ी असफलता — उसे साझा कीजिए। आपकी कहानी किसी के लिए प्रेरणा बन सकती है। मेरी ज़िंदगी ब्लॉग पर भेजें, हम उसे सम्मान और संवेदनशीलता के साथ प्रकाशित करेंगे। 🙏

No comments:
Post a Comment