जुलाई 2023 का महीना कभी नहीं भूल सकता। उस साल इतनी बारिश हुई कि चारों तरफ पानी ही पानी नज़र आने लगा। घग्गर, टांगरी और मरकंडा नदियाँ उफान मारती हुई बह निकलीं। हालात इतने बिगड़े कि मटेड़ी कस्बे के पास वाले गाँव – इस्माइलपुर, चौरमस्तपुर, बकनौर और मलौर – पूरी तरह पानी में डूब गए। खेत, घर, रास्ते – सब जलमग्न हो गए।
मैंने अपनी आँखों से देखा था कि कैसे लोगों ने अपने पालतू जानवरों को बचाने के लिए घरों की छतों पर बांध रखा था। छोटे-छोटे बच्चे, बुजुर्ग और महिलाएँ छतों से नीचे फैले पानी को डरे-सहमे देख रहे थे। कई घरों में तो लोग चार-चार दिन तक घुटनों तक पानी में डूबकर रह रहे थे।
उस समय हमारे गाँव सोंटा और पास के गाँव – सोंटी, मेहलान, भुन्नी और जंसुई – से लोग मदद के लिए आगे आए। ट्रैक्टर-ट्रॉली में भर-भरकर राशन और पशुओं के लिए भूसा लेकर हम सब पानी में उतरे। आटा और चारा उन घरों तक पहुँचाया जो पूरी तरह पानी में घिरे हुए थे। कहीं बच्चों को दूध पहुँचाया, तो कहीं बीमार बुजुर्गों के लिए दवाइयाँ।
आज भी याद है, एक घर की छत पर बैठे परिवार की आँखों में राहत के आँसू आ गए जब हमने उनके पशुओं के लिए भूसा पहुँचाया। उन्होंने हाथ जोड़कर सिर्फ इतना कहा – “भगवान भला करे बेटा, तुमने हमें और हमारे जानवरों को बचा लिया।” उस पल ने मुझे इंसानियत की असली ताकत का एहसास कराया।
बाढ़ ने बहुत नुकसान किया – फसलें बर्बाद हुईं, घर टूटे, लोग बेघर हुए – लेकिन एक चीज़ साफ हो गई कि मुश्किल में गाँववाले ही गाँववालों का सहारा बनते हैं। पानी में डूबे घरों और टूटी हुई दीवारों के बीच इंसानियत की जो दीवार खड़ी हुई, वही सबसे मजबूत थी।

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