भारत त्यौहारों की धरती है। यहाँ हर मौसम, हर अवसर किसी न किसी पर्व के रूप में मनाया जाता है। इन्हीं त्यौहारों में से एक है सांझी माता का पर्व, जो विशेषकर उत्तर भारत के गाँवों में बड़ी श्रद्धा और उत्साह से मनाया जाता था। यह त्यौहार नवरात्रों के पहले दिन से शुरू होकर नौ दिनों तक चलता है। पहले दिन घर की दीवार पर गारे से बनी सांझी माता की मूर्ति लगाई जाती थी, जिसकी नौ दिन तक पूजा होती थी और फिर नवमी को उसका विसर्जन किया जाता था।
बचपन की यादें
बचपन की सांझी का आनंद ही अलग था। त्योहार शुरू होने से 10 दिन पहले ही घर के बच्चे और लड़कियाँ तैयारी में जुट जाते थे। खेतों से काने के पौधे लाए जाते, जिनकी पतली टहनियों से छोटे-छोटे घुँघरू बनाए जाते। गारे से हम सब मिलकर सांझी माता का चेहरा, हाथ, पैर, सलवार-कुर्ती, चूड़ियाँ, टिक्कियाँ, पंछी, पेटू, यहाँ तक कि पेटू का हुक्का और कंघा तक बना डालते।
सबसे मुश्किल काम होता था सांझी माता का चेहरा बनाना। कई बार नाक बड़ी निकल जाती, कई बार कान छोटे रह जाते। लेकिन उस मासूमियत और श्रद्धा में ही असली खूबसूरती छिपी रहती थी। स्कूल से घर लौटकर सीधा सांझी बनाने बैठ जाना, फिर रंग-बिरंगे पाउडर और गेरुए से उन्हें सजाना – यह सब बचपन की सबसे मीठी यादें हैं।
आज की सांझी
आज का समय बहुत बदल चुका है। अब तो बाजार में तैयार बनी-बनाई सांझी माता की मूर्तियाँ मिल जाती हैं। लड़कियों के पास समय ही नहीं है कि वे अपने हाथों से सांझी बनाएँ। मोबाइल और इंटरनेट की दुनिया में किसके पास धैर्य है कि मिट्टी गूंथकर, हाथ गंदे कर, गारे की खुशबू के बीच श्रद्धा से कुछ रचे?
आज श्रद्धा की जगह दिखावा ज़्यादा हो गया है। मूर्तियाँ खरीदकर बस दीवार पर टांग दी जाती हैं। कोई गारे के घुँघरू नहीं बनाता, न बच्चों को यह सिखाया जाता है। सच कहूँ तो कई लोग इसे अब बेकार की बात मानने लगे हैं। पढ़ाई-लिखाई और विज्ञान के तर्कों ने लोगों को इतना घेर लिया है कि आस्था और परंपरा “पुराने ज़माने की बातें” लगने लगी हैं।
पहले और अब का फर्क
पहले लोग अनपढ़ थे, मगर उनके मन में श्रद्धा और सच्चाई थी। मिट्टी से बनी सांझी को छूने से पहले हम हाथ धोते थे, ताकि पाप न लगे। हर छोटी चीज़ में भक्ति झलकती थी।
आज लोग पढ़े-लिखे हैं, लेकिन अक्सर मन से खाली हो चुके हैं। किताबों से मिली जानकारी ही उनके लिए सच है, पर परंपराओं की आत्मा को समझने का समय किसी के पास नहीं।
शायद आने वाली पीढ़ियाँ इन सब परंपराओं को किताबों या कहानियों में ही जान पाएँगी। अगर कभी उन्हें सांझी माता की बात सुनाई जाएगी, तो वे हैरानी से पूछेंगे – “क्या सच में ऐसा भी होता था?”
लेकिन हममें से जिसने बचपन में मिट्टी से बनी सांझी को सजाया है, जिसने गारे की खुशबू और रंगों की चमक महसूस की है, वह जानता है कि यह सिर्फ एक त्योहार नहीं था, बल्कि श्रद्धा, भक्ति और परिवार को जोड़ने वाला एक अद्भुत अनुभव था।
👉 यही है ज़िंदगी की सच्चाई –
“समय बदलता है, परंपराएँ मिटती नहीं, बस स्मृतियों में नया रूप ले लेती हैं।” 🌸


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