"बारिश की पहली बूंदें… मिट्टी की वो भीनी-भीनी खुशबू… और गाँव की वो कच्ची गलियाँ, जहाँ हर नज़ारा दिल को सुकून देता है। आइए, चलें एक ऐसे गाँव में, जहाँ बारिश सिर्फ मौसम नहीं, बल्कि यादों का तोहफ़ा होती है।"
उस समय हमारे घर में टीवी नहीं हुआ करता था। हम टीवी देखने के लिए चाचा के घर जाया करते थे। चैनलों की कोई भीड़ नहीं थी — बस डीडी नेशनल, और कभी-कभार बरसात के मौसम में डीडी मेट्रो भी। वो भी साफ नहीं आता था, स्क्रीन पर "मच्छर" नाचते रहते थे, लेकिन फिर भी खुशी इस बात की होती थी कि हमारे टीवी में दूसरा चैनल चल रहा है।
शुक्रवार और शनिवार — ये दो दिन हमारे लिए त्योहार जैसे होते थे, क्योंकि तभी फिल्म आती थी। हफ्तेभर का इंतज़ार इन दो रातों के लिए होता था। आज की तरह हर वक्त चैनलों पर फिल्में नहीं आती थीं, और सच कहूँ तो तब की वो दो फिल्में ही मन को तृप्त कर देती थीं।
सुबह की शुरुआत होती थी रंगोली से — पुराने गीतों की वो मिठास दिल में उतर जाती थी। रविवार की सुबह बच्चों के लिए खास नाटक आते — उमंग, तराना। और फिर आते धारावाहिक — अलिफ लैला, शक्तिमान, शांति — जो सिर्फ मनोरंजन ही नहीं, बल्कि कहानियों, आदर्शों और सीख से भरे होते थे। उनमें रहस्य था, रोमांच था, और कहीं न कहीं इंसानियत की खुशबू भी।
रात 8:30 से 9:00 तक खबरें आती थीं, और वो हमारे लिए खाने का समय होता था। अक्सर हम अलिफ लैला देखने से आधा घंटा पहले ही पहुंच जाते, ताकि उससे पहले चलने वाले विज्ञापन भी देख लें। उस समय के विज्ञापनों में भी एक अलग सी मासूमियत थी, जो अब कहीं नहीं मिलती।
आज जब मैं टीवी चलाता हूँ, तो हर चैनल पर सिर्फ सास-बहू की कहानियाँ और बेवजह की साजिशें दिखती हैं। गीतों में बस शोर है, बोल सुनाई ही नहीं देते। पहले के गीत दिल में उतर जाते थे, आज के बस कानों पर दस्तक देकर गुजर जाते हैं।
कभी-कभी यूट्यूब पर उन पुराने धारावाहिकों या फिल्मों की झलक देख लेता हूँ, तो आंखों के सामने वो पूरा ज़माना घूम जाता है — वो चाचा का घर, वो ब्लैक-एंड-व्हाइट सी तस्वीरें, और वो बेफ़िक्र बचपन। मन करता है कि भगवान से कह दूँ — "लौटा दो वो दिन, वो लोग, वो मासूम हँसी, वो आधी अधूरी तस्वीरें, और हाँ… बचपन का सावन भी।"
जैसे जगजीत सिंह ने कहा है —
"ये दौलत भी ले लो, ये शोहरत भी ले लो,
मगर मुझको लौटा दो बचपन का सावन,
वो कागज़ की कश्ती, वो बारिश का पानी…

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