Wednesday, August 6, 2025

तीन दिन गढ्डा खोदने के बाद भी मिली नाकामी

(एक सच्ची ग्रामीण कहानी)


तीन दिन हो चुके हैं, लेकिन अभी तक कोई हल नहीं निकला। नई बनी गली अचानक धंस गई थी। वजह वही — नाली के पानी का रिसाव, जिससे पाइपलाइन भी कमजोर हो गई और गली की टूंटियाँ लीक करने लगीं। लोग एक-दूसरे को दोष देने लगे। मैंने तय किया कि अगली सुबह खुद ही गढ्डा खोद कर देखता हूँ।

सुबह-सुबह कस्सी लेकर मैदान में उतर गया। खोदते ही मेरी कस्सी एक पाइप से टकराई। लगा कि मेन पाइप मिल गया, लेकिन चाचा ने बताया — “ये तो उपर डाली हुई टूंटी का पाइप है। असली मेन पाइप तो पांच फुट नीचे है।” भाई को प्लंबर को बुलाने भेजा और खुद खोदाई में लग गया। गटके और पत्थरों से भरा इलाका खोदना आसान नहीं था।

प्लंबर आया और बताया कि मेन पाइप सही है, पानी तो नाली से रिस रहा है। उसके कहने पर खोदाई रोक दी। टूटा बैंड बदलवाया और गढ्डा एक दिन यूं ही खुला छोड़ दिया — ताकि पता चल सके कि पानी सच में वहीं से लीक हो रहा है या नहीं।

शाम को चाची आईं और कहा, "गढ्डा तो भर रहा है पानी से।" डर तो लगा, पर सुबह तक पूरा गढ्डा पानी से भर चुका था। तय किया, अब तो खोदना पड़ेगा।

दूसरे दिन दोपहर तक पांच फुट गहरा गढ्डा खोद डाला। पाइपलाइन दिखाई देने लगी। फिर प्लंबर को बुलाया — उसने देखा, समझा और बोला, "ये तो नहीं रुकेगा, मेन पाइप ही बदलवाना पड़ेगा।" गांव के सरपंच जी के पिताजी भी बोले, “लिखित शिकायत कर देते हैं, बदलवा लेंगे।”

तीसरा दिन हो गया। कोई हल नहीं। सोचा, खुद ही कोशिश कर लेते हैं। मैं गढ्डे में उतरा, पानी निकाला, क्लंप खोला। चाचा का बेटा संजय, ताया का बेटा छज्जू — सब मदद कर रहे थे। ट्यूब काटकर क्लंप के नीचे लगाई, फिर टाइट किया। पर लीकेज बंद नहीं हुआ। नट भी पानी में गिर गया। बड़ी मुश्किल से मिला।

आखिरकार लीकेज थोड़ी कम हुई। तभी वाटर सप्लाई वाले का फोन आया, "मेन पाइप बदलेगा, हफ्ता लगेगा। गढ्डा खुला छोड़ दो।" सोचा, जब बंद नहीं हो रहा, मिट्टी डालकर गढ्डा बंद कर देते हैं, कम से कम रास्ता तो खुलेगा।

लेकिन सुबह एक ट्रैक्टर निकला, और पानी फिर ऊपर आ गया — जैसे हमें चिढ़ा रहा हो।

तीन दिन की मेहनत... गारा ही मिला। अब उम्मीद सरकार से ही है — क्या वो पाइपलाइन बदलवाएंगे या फिर एक और लारा...

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