Monday, October 20, 2025

परिजात का वृक्ष – धरती पर स्वर्ग की सुगंध

प्रकृति ने जब इस धरती को सजाया होगा, तब शायद परिजात के फूलों को बनाते हुए उसने अपनी सारी कोमलता, सुंदरता और सुगंध इसमें डाल दी होगी। परिजात का वृक्ष, जिसे हरसिंगार या नाइट फ्लावरिंग जैस्मीन भी कहा जाता है, न केवल अपनी सुंदरता से मन मोह लेता है, बल्कि इसके पीछे जुड़ी पौराणिक कथाएँ और आध्यात्मिक महत्व इसे एक दिव्य वृक्ष बना देते हैं। 


 


 परिजात का परिचय

परिजात का वैज्ञानिक नाम Nyctanthes arbor-tristis है, जिसका अर्थ है — “वह वृक्ष जो रात में खिलता है और सुबह अपनी पंखुड़ियों को बिछा देता है।” यह वृक्ष 10–15 फीट तक ऊँचा होता है, और इसकी शाखाएँ पतली, झुकी हुई और कोमल होती हैं। इसके फूल छोटे, सफेद रंग के होते हैं जिनका केंद्र केसरिया होता है। यही केसरिया रंग इसकी पहचान बन जाता है।

रात के समय जब यह फूल खिलते हैं, तो इसकी खुशबू पूरे वातावरण को स्वर्गीय बना देती है। और जब सुबह होती है, तब यह फूल ज़मीन पर ऐसे बिछ जाते हैं जैसे किसी ने आँगन में फूलों की चादर बिछा दी हो।


परिजात का पौराणिक महत्व

हिन्दू धर्म में परिजात का वृक्ष अत्यंत पवित्र माना जाता है। भागवत पुराण और महाभारत के अनुसार, परिजात का जन्म समुद्र मंथन के समय हुआ था। जब देवता और असुर अमृत प्राप्त करने के लिए समुद्र मंथन कर रहे थे, तब इसी मंथन से चौदह रत्नों में से एक था — परिजात वृक्ष।

कहा जाता है कि यह वृक्ष पहले स्वर्गलोक में इंद्र के उपवन में लगाया गया था। जब श्रीकृष्ण ने स्वर्ग से यह वृक्ष पृथ्वी पर लाकर अपनी पत्नी सत्यभामा के बगीचे में लगाया, तब से यह वृक्ष मानव लोक में भी पूजनीय हो गया।

इस वृक्ष को “स्वर्ग का उपहार” कहा जाता है क्योंकि यह देवताओं और मनुष्यों के बीच एक आध्यात्मिक सेतु का प्रतीक है।


धार्मिक उपयोग और श्रद्धा

परिजात के फूलों का प्रयोग भगवान विष्णु, शिव और दुर्गा की पूजा में किया जाता है। यह फूल अपने पवित्र रंग और सुगंध के कारण आरती और पूजन सामग्री में विशेष स्थान रखता है।

कई मंदिरों में परिजात के वृक्ष को विशेष रूप से लगाया जाता है क्योंकि माना जाता है कि जहाँ यह वृक्ष होता है, वहाँ नकारात्मक ऊर्जा प्रवेश नहीं कर पाती।

इसके अलावा, महिलाएँ अक्सर सुबह-सुबह इसके गिरे हुए फूलों को बटोरती हैं और पूजा में चढ़ाती हैं।


औषधीय गुण

परिजात केवल एक सुंदर वृक्ष नहीं है, बल्कि यह अनेक औषधीय गुणों से भरपूर है। आयुर्वेद में इसके पत्ते, फूल, और छाल का उपयोग कई रोगों के उपचार में किया जाता है।

  • इसके पत्तों का रस बुखार और जोड़ों के दर्द में राहत देता है।

  • फूलों का अर्क त्वचा की चमक बढ़ाने और मन को शांत रखने में सहायक माना जाता है।

  • छाल और बीज का उपयोग खांसी, सर्दी और पाचन संबंधी समस्याओं में किया जाता है।

इस प्रकार, परिजात न केवल सौंदर्य का प्रतीक है बल्कि स्वास्थ्य का भंडार भी है।


भावनात्मक और आध्यात्मिक संदेश

परिजात का फूल हमें एक गहरी सीख देता है — “सौंदर्य और महक को अपने भीतर समाए रखो, परंतु प्रदर्शन के बिना।”
यह फूल रात में खिलता है और सुबह खुद गिर जाता है, लेकिन अपनी सुगंध से सबको भर देता है। यह सिखाता है कि सच्ची सुंदरता विनम्रता में है।

जब हम इसके गिरे हुए फूलों पर चलते हैं, तो ऐसा लगता है जैसे प्रकृति हमें सिखा रही हो कि जीवन में सबसे सुंदर चीजें अक्सर बिना शोर के आती हैं — जैसे परिजात की खुशबू।


 परिजात के प्रसिद्ध स्थान

भारत में कई जगहों पर परिजात के वृक्ष को धार्मिक दृष्टि से देखा जाता है। उत्तर प्रदेश के कांसी (बराबंकी) जिले में स्थित “परिजात का पेड़” सबसे प्रसिद्ध है। कहा जाता है कि यह पेड़ स्वयं भगवान कृष्ण द्वारा लगाया गया था और आज भी जीवित है।

इसके अलावा, हरिद्वार, वृंदावन, और गुवाहाटी जैसे धार्मिक स्थलों में भी परिजात के वृक्ष देखे जा सकते हैं, जो भक्तों को आध्यात्मिक शांति का अनुभव कराते हैं।


परिजात का वृक्ष केवल एक पेड़ नहीं, बल्कि आस्था, सुंदरता और आध्यात्मिकता का प्रतीक है। यह हमें यह सिखाता है कि जीवन में सच्ची शांति बाहरी दिखावे से नहीं, बल्कि भीतर की सुगंध से आती है।

जब भी आप किसी परिजात के वृक्ष के नीचे जाएँ, तो उसकी गिरी हुई पंखुड़ियों को देखिए — वे हमें याद दिलाती हैं कि सच्ची महानता झुकने में है, न कि ऊँचा दिखने में।


अगर आपके जीवन में कभी थकान या बेचैनी महसूस हो, तो परिजात के वृक्ष के नीचे कुछ पल बैठिए — उसकी सुगंध आपको याद दिलाएगी कि शांति हमेशा भीतर से आती है।

Sunday, October 19, 2025

भक्ति में शक्ति – जब आस्था बनती है ऊर्जा

कहते हैं — “जहाँ भक्ति होती है, वहाँ असंभव भी संभव हो जाता है।”

सच ही तो है, भक्ति केवल भगवान की आराधना नहीं, बल्कि आत्मा की शक्ति का स्रोत है। जब इंसान पूरे मन, पूरे विश्वास और पूरे समर्पण के साथ ईश्वर को पुकारता है, तब उसके भीतर एक ऐसी ऊर्जा जन्म लेती है जो हर कठिनाई को मात दे सकती है। 



 भक्ति क्या है?

भक्ति कोई रीति-रिवाज नहीं, यह एक भावना है। यह वह पुल है जो मनुष्य को परमात्मा से जोड़ता है। जब व्यक्ति भक्ति के मार्ग पर चलता है, तो उसके भीतर से नकारात्मकता, भय और असंतोष मिटने लगता है।
भक्ति वह दीपक है जो अंधकार में भी उजाला कर देती है।


भक्ति से मिलने वाली शक्ति

भक्ति की सबसे बड़ी शक्ति “आत्मविश्वास” है।
जब हमें यह एहसास होता है कि कोई अदृश्य शक्ति हमारे साथ है, तो हम जीवन की हर परीक्षा में दृढ़ता से खड़े रहते हैं।
सीता माता ने भक्ति से ही कठिन वनवास सहा, हनुमान जी ने अपनी भक्ति से पर्वत उठा लिया, मीरा ने अपने प्रेम और विश्वास से विष का प्याला भी अमृत बना दिया।

भक्ति हमें भीतर से मजबूत बनाती है —
यह हमें सिखाती है कि विपत्ति चाहे कितनी भी बड़ी क्यों न हो, विश्वास और धैर्य से उसका सामना किया जा सकता है।


 भक्ति और कर्म का संबंध

सच्ची भक्ति केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं।
जो अपने कार्य को निष्ठा और ईमानदारी से करता है, वह भी एक भक्त है।
कृष्ण ने गीता में कहा — “कर्म करते रहो, फल की चिंता मत करो।”
यही तो भक्ति का सार है — अपने कार्य को भगवान को समर्पित कर देना।

जब हम काम को पूजा मान लेते हैं, तो जीवन सरल हो जाता है।
हर प्रयास, हर कदम, हर सफलता — ईश्वर के प्रति समर्पण बन जाता है।


 भक्ति से मिलने वाली शांति

आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में लोग शांति की तलाश में हैं।
लेकिन शांति बाहर नहीं, भीतर है — और उसे पाने का मार्ग है भक्ति।
भक्ति हमें सिखाती है कि सुख-दुख, लाभ-हानि, जीत-हार — सब ईश्वर की इच्छा से हैं।
जब हम इस सत्य को स्वीकार कर लेते हैं, तो मन अपने आप शांत हो जाता है।


भक्ति में ही सच्ची शक्ति छिपी है —

यह शक्ति शरीर की नहीं, आत्मा की है।
जो व्यक्ति सच्चे मन से भक्ति करता है, उसके पास वह ताकत होती है कि वह जीवन के हर तूफान को मुस्कुराकर झेल सके।

भक्ति हमें झुकना सिखाती है, परंतु कमजोर नहीं बनाती।
यह हमें विनम्र बनाती है, पर भीतर से अडिग रखती है।


भक्ति का अर्थ है — विश्वास रखना, समर्पण करना और प्रेम में जीना।
क्योंकि जब हृदय में भक्ति होती है, तब इंसान केवल इंसान नहीं रहता — वह स्वयं भगवान का अंश बन जाता है। 

Saturday, October 18, 2025

एक छोटी-सी खुशी

ज़िंदगी की इस भाग-दौड़ भरी दुनिया में हम सब कुछ बड़ा पाने की चाह में लगे रहते हैं — बड़ा घर, बड़ी नौकरी, बड़ी गाड़ी और बड़ा नाम। लेकिन इन सबकी तलाश में हम अक्सर उन छोटी-छोटी खुशियों को नज़रअंदाज़ कर देते हैं, जो सच में दिल को सुकून देती हैं। सच्ची खुशी हमेशा किसी बड़ी चीज़ में नहीं होती, बल्कि उन छोटे-छोटे पलों में छिपी होती है, जिन्हें हम जीना भूल गए हैं। 



कभी सोचिए — जब बरसों बाद किसी पुराने दोस्त का फोन आता है, जब अचानक कोई प्यारा गाना कानों में गूंज उठता है, या जब सुबह की चाय के साथ धूप की हल्की गरमाहट चेहरे को छूती है — यही होती हैं “छोटी-छोटी खुशियाँ”। ये वो पल हैं जो न किसी दुकान में बिकते हैं, न किसी सोशल मीडिया पोस्ट में दिखते हैं, पर इनका असर सबसे गहरा होता है।

कभी घर की छत पर बैठकर शाम की ठंडी हवा में चाय की चुस्की लेना,
कभी रास्ते में किसी बच्चे की हँसी सुन लेना,
कभी माँ के हाथों का बना खाना खाना —
ये सब वो क्षण हैं जो दिल को अंदर तक छू जाते हैं।

हमने ज़िंदगी को इतना जटिल बना लिया है कि अब खुशी ढूँढनी पड़ती है।
पर सच तो यह है कि खुशी कभी खोई ही नहीं थी, हमने बस ध्यान देना बंद कर दिया।
एक छोटी-सी मदद करने से जो मुस्कान किसी के चेहरे पर आती है, वही असली खुशी है।
किसी अनजान व्यक्ति को रास्ता बताना, किसी जानवर को पानी पिलाना, या किसी बच्चे को चॉकलेट देना — ये सब छोटी बातें हैं, लेकिन दिल में एक मीठा सुकून छोड़ जाती हैं।

छोटी खुशियाँ हमें यह सिखाती हैं कि जीवन का आनंद “भविष्य में कुछ बड़ा पाने” में नहीं, बल्कि “आज के छोटे पलों को महसूस करने” में है।
हर रोज़ जब सूरज उगता है, तो वो हमें याद दिलाता है कि एक नया दिन, एक नई शुरुआत, और एक नई मुस्कान फिर से हमारे पास है।

एक छोटी-सी खुशी में जीवन की बड़ी सीख छिपी होती है।
वो सिखाती है कि सुकून का रास्ता भीतर से निकलता है, बाहर से नहीं।
अगर हम अपने दिन की शुरुआत एक मुस्कान से करें, और रात को आभार के साथ खत्म करें, तो हर दिन खुशी से भरा होगा।
कभी किसी फूल को खिलते देखना, या किसी पक्षी को उड़ते हुए देखना — बस इतना ही काफी है यह याद करने के लिए कि ज़िंदगी सुंदर है, बस हमें देखने की नज़र चाहिए।

तो आज से तय कीजिए — किसी बड़ी चीज़ के इंतज़ार में अपनी छोटी-छोटी खुशियों को मत खोइए।
क्योंकि अक्सर वही छोटी-सी खुशी, जीवन की सबसे बड़ी मुस्कान बन जाती है।

आदम और हव्वा – इंसानियत की शुरुआत की कहानी

कहते हैं, हर कहानी की शुरुआत एक “पहली सांस” से होती है — और इंसानियत की पहली सांस थी आदम।

ईश्वर ने मिट्टी से आदम को गढ़ा, उसमें अपनी रूह फूंकी, और कहा —

“तू मेरी सबसे सुंदर रचना है।”

जन्नत का वह बाग, जहाँ न कोई दुख था, न कोई दर्द — वहीं आदम को बसाया गया।
हर ओर हरियाली थी, बहते झरने थे, खुशबू थी, और संतुलन था।
पर एक चीज़ की कमी थी — संगत की।
तभी ईश्वर ने आदम की पसली से हव्वा को बनाया — ताकि वह साथी बनें, जीवन का अर्थ बनें।
और इस तरह शुरू हुई प्रेम, विश्वास और परीक्षा की कहानी। 



ईश्वर ने उन्हें सब कुछ दिया —
फल, फूल, आज़ादी, और शांति।
बस एक बात कही —

“इस एक पेड़ के पास मत जाना।”

वह पेड़ ज्ञान और अहंकार का प्रतीक था।
पर शैतान (Iblis) ने हव्वा के मन में संदेह बो दिया —

“अगर तुम इस पेड़ का फल खाओगी, तो देवताओं जैसी बन जाओगी, कभी नहीं मरोगी।”

हव्वा ने फल खाया, और आदम ने भी।
उसी पल उनकी मासूमियत खो गई —
अब वे अपनी गलती, अपनी नग्नता, अपने निर्णय को समझने लगे।


जब ईश्वर ने पूछा —

“आदम, क्या तुमने मेरा आदेश तोड़ा?”

आदम चुप थे।
हव्वा ने सिर झुका लिया।
गलती छोटी थी, लेकिन संदेश बड़ा था —
"हर आज़ादी की भी एक सीमा होती है।"

ईश्वर ने उन्हें माफ तो किया, पर एक सीख देने के लिए धरती पर भेज दिया।
वहीं से शुरू हुआ इंसान का असली सफर —
मेहनत, संघर्ष, प्रेम और कर्म का।


धरती पर आदम और हव्वा ने खेती की, जीवन बसाया, और अपने बच्चों को सिखाया —
कि इंसान होना सिर्फ जन्म लेना नहीं है, बल्कि अपनी गलतियों से सीखना है।
उन्होंने दिखाया कि गलती करना पाप नहीं, पर गलती पर अड़े रहना पाप है।
उन्होंने सिखाया कि ईश्वर सिर्फ जन्नत में नहीं रहते, बल्कि हर उस इंसान में रहते हैं जो सच्चा और ईमानदार है।


समय बीतता गया, और आदम-हव्वा की कहानी पीढ़ी दर पीढ़ी चलती रही।
हर धर्म, हर संस्कृति में उनकी कहानी बदलते रूपों में सुनाई गई,
पर संदेश हमेशा एक ही रहा —

“इंसानियत वही है जो विनम्रता, प्रेम और क्षमा में है।”


संदेश

आदम और हव्वा की कहानी सिर्फ शुरुआत की कहानी नहीं,
बल्कि हर इंसान की आत्मकथा है —
कभी हम भी लालच में पड़ जाते हैं,
कभी गलती करते हैं,
कभी जन्नत खो देते हैं,
पर अगर सच्चे मन से तौबा करें, तो धरती भी जन्नत बन सकती है।



हम सब के भीतर एक “आदम” है जो सच्चाई ढूंढता है,
और एक “हव्वा” है जो भावना से निर्णय लेती है।
जीवन का असली सौंदर्य तब है, जब दोनों साथ मिलकर सीखते हैं —
कि ईश्वर हमें गिराने नहीं, संभालने के लिए परीक्षाएँ देता है।

Friday, October 17, 2025

एक अनार सौ बीमार – आज के समाज की सच्चाई

“एक अनार सौ बीमार” — यह मुहावरा हम सबने बचपन से सुना है। इसका अर्थ है — जब किसी वस्तु या व्यक्ति की माँग अधिक हो और उपलब्धता बहुत कम, तब उस चीज़ के लिए झगड़ा या प्रतिस्पर्धा होना स्वाभाविक है। यह सिर्फ एक कहावत नहीं, बल्कि आज के समाज की सच्चाई बन चुकी है। 


पहले यह मुहावरा केवल किसी मज़ाकिया प्रसंग में कहा जाता था, लेकिन आज हर क्षेत्र में इसकी झलक दिखाई देती है।
चाहे नौकरी पाने की बात हो या किसी कॉलेज में एडमिशन की — एक सीट के लिए सौ लोग कतार में खड़े नज़र आते हैं। यही “एक अनार सौ बीमार” की स्थिति है।

गाँव में कोई नया सरकारी प्लान आता है, तो लोग दौड़ पड़ते हैं। शहरों में कोई नया फ़्लैट सस्ता बिकने लगे तो हजारों लोग बुकिंग लाइन में लग जाते हैं।
यह स्थिति सिर्फ वस्तुओं या अवसरों की नहीं, बल्कि रिश्तों और भावनाओं की दुनिया में भी देखने को मिलती है।
किसी जगह थोड़ा सा स्नेह, थोड़ा सा आदर दिखा तो सौ लोग उसे पाने को तैयार हो जाते हैं — क्योंकि असली प्यार और ईमानदारी अब दुर्लभ हो चली है।

“एक अनार सौ बीमार” यह भी सिखाता है कि जब माँग बढ़ती है, तो लालच और असमानता भी बढ़ जाती है। कुछ लोग तो वह अनार पाने के लिए गलत रास्ते भी चुन लेते हैं — रिश्वत, धोखा या जुगाड़ के रूप में।
यह प्रतिस्पर्धा हमें मेहनती तो बनाती है, लेकिन कभी-कभी इंसानियत भूलने पर मजबूर भी कर देती है।


जीवन में हर किसी को अनार नहीं मिल सकता, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि कोशिश छोड़ दी जाए।
हर व्यक्ति में अपनी एक अलग पहचान है, अपनी मेहनत का फल है।
अगर हम “अनार पाने” की जगह “अपने बाग में अनार उगाने” की सोच रखें — यानी अपनी योग्यता और कर्म से नए अवसर पैदा करें — तो न किसी को जलन होगी, न निराशा।


ज़िंदगी में दूसरों के अनार के पीछे भागने के बजाय, अपने भीतर की मिट्टी को सींचिए।
कभी न कभी, आपका अपना बाग़ भी खिल उठेगा।

Thursday, October 16, 2025

अंधेरा जितना गहरा होगा, सुबह उतनी ही नज़दीक होगी

जीवन में हर इंसान कभी न कभी ऐसे दौर से गुजरता है जब चारों ओर अंधेरा ही अंधेरा नजर आता है। रास्ते बंद लगते हैं, उम्मीदें टूटने लगती हैं, और मन हार मानने लगता है। लेकिन सच यही है — अंधेरा जितना गहरा होता है, सुबह उतनी ही नज़दीक होती है। यह वाक्य सिर्फ एक कहावत नहीं, बल्कि जीवन का गहरा सत्य है। 


 जब सब खत्म सा लगे...

कभी-कभी हालात ऐसे बन जाते हैं कि लगता है अब कुछ नहीं बदलेगा। जैसे जीवन एक ठहरे हुए तालाब की तरह हो गया हो। लेकिन क्या आपने कभी गौर किया है कि सबसे अंधेरी रात हमेशा सुबह से ठीक पहले आती है?
ठीक वैसे ही, जब जीवन में मुश्किलें अपने चरम पर होती हैं, जब सब कुछ उलझा हुआ लगता है — वहीं कहीं पास में एक नई शुरुआत छिपी होती है।


 संघर्ष ही सफलता की राह है

जो लोग जीवन में कुछ बड़ा करते हैं, उन्होंने भी यह अंधेरा झेला है। किसी ने असफलताओं का सामना किया, किसी ने अकेलेपन का, तो किसी ने समाज की आलोचनाओं का।
लेकिन वे नहीं रुके — क्योंकि उन्हें विश्वास था कि यह दौर भी गुजर जाएगा।
अंधेरा हमेशा स्थायी नहीं होता, वह सिर्फ हमें मजबूत बनाना सिखाता है।

जैसे किसान बीज बोने के बाद अंधेरे में इंतज़ार करता है, उसे पता होता है कि एक दिन वही बीज सूरज की रोशनी में अंकुर बन जाएगा।


 उम्मीद की लौ बुझने न दो

जीवन में कभी ऐसी स्थिति आए कि सब खत्म लगता हो, तो अपने अंदर की उम्मीद की छोटी सी लौ को जलाए रखो।
याद रखो — सूरज को उदय होने में बस एक पल लगता है, पर उसकी रोशनी पूरे ब्रह्मांड को जगमगा देती है।
वैसे ही, आपकी एक छोटी सी कोशिश, एक नया विचार या एक नई उम्मीद, आपके जीवन की दिशा बदल सकती है।


 हर अंधेरा किसी उजाले की निशानी है

अगर अंधेरा नहीं होता तो हमें उजाले की कीमत कैसे समझ आती?
अगर दुख नहीं होते तो खुशी का एहसास कैसे होता?
जीवन का संतुलन इसी में है — हर अंधेरे के बाद उजाला जरूर आता है।
इसलिए जब भी जीवन कठिन लगे, जब मन टूटने लगे — बस खुद से कहो,
"यह अंधेरा मेरी सुबह का संकेत है।"


जीवन के हर अंधेरे पल को एक अवसर की तरह देखो।

क्योंकि ये वही पल हैं जो तुम्हें मजबूत बनाते हैं, जो तुम्हारे भीतर के असली इंसान को जगाते हैं।
याद रखो — अंधेरा जितना गहरा होगा, सुबह उतनी ही नज़दीक होगी।
बस चलते रहो, विश्वास बनाए रखो, और देखना — तुम्हारा सूरज बहुत जल्द उगेगा।

छत पर उड़ी धूल में बसती यादें

 गर्मियाँ जब अपने आख़िरी पड़ाव पर होती हैं, तब गाँव के खेतों में हरियाली की एक अलग ही रौनक दिखाई देती है। बरसीम की घास लहलहा उठती है, और सरसों के खेत पीले फूलों से ऐसे झूमते हैं जैसे धरती ने सुनहरी चादर ओढ़ ली हो। ऐसे ही दिनों में याद आती है अपने बचपन की — जब हमारी गाय के लिए खेतों से घास लाना, सरसों की कटाई करना और फिर माँ का उन दानों को छानना-जाँचना, सब कुछ जीवन का हिस्सा हुआ करता था। 



हमारे घर में एक गाय हुआ करती थी। उसी के लिए खेत में कुछ जगह पर घास बोई जाती थी। पास ही सरसों के पौधे भी लगे रहते थे। जब सरसों पक जाती, तो उसे काटकर उसकी पुलियाँ बाँध ली जातीं और फिर माँ उन्हें घर की छत पर सुखाने के लिए रख देतीं। कुछ दिनों की धूप के बाद जब सरसों सूख जाती, तो माँ डंडे से उन्हें पीटकर दाने निकालती। उस समय छत पर सरसों की महक और मिट्टी की खुशबू फैल जाती थी।

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लेकिन ये काम आसान नहीं था। जब माँ “छाज” की सहायता से सरसों को झाड़ती थीं, तो हवा में धूल उड़ती रहती। उनके बाल, चेहरा सब सफेद पड़ जाते — जैसे किसी ने पाउडर छिड़क दिया हो। हम बच्चे भी छत पर पहुँच जाते, पर धूल की वजह से ज़्यादा देर टिक नहीं पाते। माँ फिर भी लगी रहतीं — बिना थके, बिना रुके।

जब सारे दाने अलग हो जाते, तब वही सरसों हमारे घर के तेल की शान बनती। माँ कहतीं — “घर का तेल ही असली होता है, बाज़ार का तो सब मिलावटी है।”

बचपन में जब गेहूँ या धान की कटाई होती, तो हम भी खेतों से बची हुई बालियाँ इकट्ठी करते थे। उन्हें घर लाकर माँ डंडे से झाड़ देतीं और जो अनाज निकलता, वो या तो घर में रख लिया जाता या कभी-कभी हमें पाँच-दस रुपये देकर कहा जाता — “जा बेटा, इसे रख ले।”
वो छोटे-छोटे रुपये भी उस समय अनमोल लगते थे।

अब जब सड़कों पर परदेसियों को खेतों से आई बालियाँ झाड़ते देखता हूँ, तो वही दृश्य आँखों के सामने घूम जाता है। वही धूल भरी दोपहरें, वही माँ का माथे से बहता पसीना, और वही छत पर फैली सरसों की महक… सब यादों में ताज़ा हो उठते हैं।

समय ने बहुत कुछ बदल दिया है — अब न वो खेत रहे, न वो मौसम, न वो बचपन की सरल खुशियाँ। लेकिन माँ की मेहनत, सरसों की खुशबू और खेतों की वो सुनहरी यादें आज भी दिल में बसती हैं।
कभी-कभी लगता है, अगर यादों की कोई राह होती, तो हम वापस लौट जाते उन दिनों में — जब धूल में भी सुकून था, और मेहनत में भी मिठास।


अगर आपके दिल में भी ऐसी कोई बचपन की यादें छुपी हैं, तो उन्हें सँजोकर रखिए। ज़िंदगी की असली ख़ुशबू इन्हीं सादे पलों में छिपी है।

उम्मीद का दीया

  एक घर में पाँच दीये जल रहे थे।  उनकी रोशनी से पूरा घर जगमगा रहा था। हर दीया अपने भीतर एक अलग संदेश और एक अलग भावना लिए हुए था। पहला दीया उ...