गांव की सर्दियां अपने आप में एक अनुभव होती हैं — कोहरे से ढके खेत, ठंडी हवाएं और मिट्टी की सौंधी खुशबू। ऐसी ही एक सुबह की एक सच्ची झलक है ये कहानी, जिसमें पिता और पुत्र के रिश्ते की गर्माहट, खेतों की ठंडी मिट्टी में भी महसूस होती है।
सर्दियों की वो सुबह कुछ खास थी। खेतों में कोहरा अपनी चादर फैलाए सोया था और सूरज अभी तक आसमान पर पूरी तरह से नहीं चढ़ा था। गांव के रास्ते शांत थे, और दूर-दूर तक केवल पत्तों के सरसराने की आवाज़ थी।
पिताजी उस दिन सुबह-सुबह ही गन्ने के खेत में पहुँच गए थे। खेत के बीचों-बीच बैठकर वे गन्ने छील रहे थे। उनके हाथों की रफ्तार और वर्षों का अनुभव देखकर लगता था जैसे ये काम वे आंखें बंद करके भी कर सकते हैं।
इधर घर में मवेशियों के लिए गन्ने की घास की ज़रूरत थी। माँ ने कहा, "पिताजी खेत में हैं, तुम जाकर उनसे घास ले आओ।" मैं अपनी पुरानी साइकिल पर बैठा और खेत की ओर निकल पड़ा। रास्ता कीचड़ और ओस से भरा हुआ था, और जगह-जगह फिसलन थी।
जैसे-जैसे खेत नज़दीक आया, कोहरा गाढ़ा होता जा रहा था। खेत में पहुंचकर देखा, पिताजी धुंध में भी अपने काम में मगन थे। उन्होंने मुझे देख मुस्कुरा कर कहा, "आ गया छोटू? ले पकड़ ये घास, और ध्यान से ले जाना, गिर मत जाना!"
मैंने घास उठाई और साइकिल पर बांधने लगा, पर कीचड़ में पैर फिसल गया और गिर पड़ा। पिताजी ठहाका मारकर हँस पड़े। फिर उन्होंने मुझे उठाया, मिट्टी झाड़ी और प्यार से सिर सहलाया।
घास लेकर जब मैं वापस चला, तो मेरे पीछे पिताजी का वो स्नेहिल हाथ और सर्द खेतों में बसी एक मीठी याद रह गई।
वो एक सर्द सुबह सिर्फ एक खेत की यात्रा नहीं थी, बल्कि एक एहसास था — पिता के साथ बिताए उन कुछ क्षणों का, जो उम्र भर दिल में गर्माहट भरते रहेंगे।
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