Friday, August 22, 2025

छत पर सोने की रातें और तारों की बातें

✍️ लेखक: L Suresh Kumar


गर्मियों की रातें... और गाँव का वो खुला आकाश। दिन भर की दौड़-भाग और मस्ती के बाद जैसे ही रात होती, घर की छत पर चारपाइयाँ बिछने लगती थीं। एक-एक कर सब ऊपर आते — दादी, चाची, मम्मी, पापा और हम भाई-बहन। हर किसी की अपनी तय जगह होती थी, लेकिन बच्चों को हमेशा झगड़ा रहता था — “मैं दादी के पास सोऊँगा!”, “नहीं! आज मेरी बारी है!”

चारपाइयों पर सफेद चादर बिछती, सिरहाने तकिए लगते और कहीं-कहीं मच्छरदानी भी। लेकिन हम बच्चों का ध्यान सिरहाने नहीं, ऊपर आसमान में होता। वो रात का चमकता आसमान… लाखों तारे… जैसे कोई चुपचाप हमें निहार रहा हो।

दादी कहानियाँ सुनाती थीं — राजा-रानी की, परियों की, भूतों की… और सबसे ज़्यादा मज़ा आता था जब वो तारों के बारे में बतातीं —
“
वो देखो, सप्तऋषि!”,
“
वो जो चमक रहा है, वो तारा नहीं, शुक्र है”,
“
और वो? वो ध्रुव तारा… जो कभी नहीं हिलता!”

कभी-कभी अचानक कोई तारा टूटता, और हम सब जोर से बोलते — “देखा! देखा! तारा टूटा!” — और मन ही मन कोई ख्वाहिश मांगते। उस समय लगता था कि तारे सच में हमारी बातें सुनते हैं।

रात की ठंडी हवा, चादर में मुंह छुपाकर दबी-दबी हँसी, और आसमान के नीचे वो गहरी नींद… वो एहसास किसी महंगे बिस्तर से कहीं ज़्यादा सुकूनभरा होता था।

आज शहर की ऊँची इमारतों में वो छतें नहीं रहीं, ना वैसा आसमान। पर वो छत पर बिताई रातें आज भी दिल में बसी हैं — एक मीठी नींद की तरह, जिसे कभी भुलाया नहीं जा सकता।


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